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प्रस्तुत ग्रंथ ""वेदान्त-गीता"" सात्विक बुद्धि का प्रतिनिधित्व करती है। वेदांत का उद्घोष है- जिस सुख को बाहर संसार में ढूंढ रहे हैं! वह सुख वहां नहीं
...
है। वह ढूंढने वाले के अंदर है। वेदांत शास्त्र का कहना है-
""आंनद तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।"" अपने स्वरूप के अज्ञान से तुम उस आंनद को बाह्य संसार और शरीर में ढूंढ रहे हो! मन बुद्धि आदि अंत:करण में ढूंढ रहे हो! उस आंनद को कोई ईश्वर का नाम देकर भक्तियोग के द्वारा पाना चाहता है। कोई उस आंनद को सांसारिक भोग समझ कर कर्मयोग के द्वारा पाना चाहता है। क्योंकि वह अपने आंनद स्वरूप को भूल गया है। गीता के अनुसार-
""जैसे अग्नि अपने ही धुएं से छुप जाती है, वैसे ही आत्मज्ञान भी अपने अज्ञान से ढका हुआ है। आंनद प्राप्ति के लिए इस अज्ञान को नस्ट करो। आंनद तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। तुम शरीर नहीं हो। मन या बुद्धि भी तुम्हारा स्वरूप नहीं है। तुम्हारा स्वरूप आंनद है! उसे जानो। अज्ञान से तुम स्वयं को मनुष्य या मन बुद्धि मान बैठे हो। जीव मान बैठे हो। और भी न जाने क्या क्या मान बैठे हो!""
अपने इस मान्यता रूपी अज्ञान को नस्ट करना ही मनुष्य का लक्ष्य है। और यही सच्ची जीव सेवा है।
प्रस्तुत ग्रंथ का उद्देश्य भी इसी आंनद प्राप्ति के अर्थ में जीवसेवा है। या यों कहें कि जीवसेवा का एक प्रयास है। और अपना अज्ञान नस्ट करना ही सच्ची जीव सेवा है।
धन्यवाद
शशिकांत दुबे (साक्षी)
H17\ ब्लॉक2
वसुन्धरा पार्क रेसीडेंसी
सत्तिपारा
अंबिकापुर (छ.ग.)
पिन- 497001
मोबाइल- 9406037085
Email- [email protected]"
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Genres
Self-Help & Personal Development
Tags
Self-Help
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
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Publishing Info
Publisher
Booksclinic Publishing
Month-Year
Aug, 2020
ISBN
ISBN-13: 9789389757453
ISBN-10: 9389757452
Language
Hindi
No. of Pages
138
Format
Paperback
Awards & Recognition
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