Aacharya Chatursen
Description
‘वयं रक्षामः' में प्राग्वेदकालीन जातियों के सम्बन्ध में सर्वथा अकल्पित अतर्कित नयी स्थापनाएँ हैं, मुक्त सहवास है, विवसन विचरण है, हरण और पलायन है। शिश
...
न देव की उपासना है, वैदिक-अवैदिक अश्रुत मिश्रण है। नर मांस की खुले बाज़ार में बिक्री है, नृत्य है, मद है, उन्मुख अनावृत यौवन है। यह सब मेरे वे मित्र कैसे बर्दाश्त करेंगे भला, जो अश्लीलता की सम्भावना से सदा ही चौंकायमान रहते हैं।
Read more