संपादक राजीव दुबे
Description
कविता वास्तव में भाव का ऐसा बंधन है जो कि सामाजिक सरोकार, प्राकृतिक, राजनीतिक भावना,प्रेम,छल,तनाव,घृणा विशालता, न्यून्ता व्यक्त करती है। आज संपूर्ण वि
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श्व जिस भयंकर महामारी से जूझ रहा है इससे कोई भी तनिक अछूता नहीं है। मेरा मानना है कि कोरोनाकाल में या यूं कहो कि आज के इस भयंकर महामारी वाले परिवेश में अगर किसी ने कुछ अलग किया है। तो वह सिर्फ लेखन कार्य है। जिसके के माध्यम से मानव जाति ने ना सिर्फ अपने भावों को व्यक्त करके ,अपने आपको सुखद किया बल्कि समाज के लिए भी एक प्रेरणा मंत्र दिया है। इसी क्रम में आज यह साझा काव्य संकलन "विदित" सम्मिलित कवियों के श्रम साध्य का परिणाम है।प्रस्तुत साझा काव्य संकलन "विदित" में सम्मिलित सभी रचनाकारों का मैं हृदय से आभारी हूं कि उन्हें अपनी रचनाओं को समय पर उपलब्ध करा दिया।
प्रस्तुत साझा काव्य संकलन की कविता 'फूल की चाह कोरोना के काल' करो ना कॉल की वास्तविक स्थिति बयान करती है। इसी क्रम में कविता कैसा वादा, छोटी सी जिंदगी है, एवं याद कब करते भला छोड़कर जाने वाले आदि रचनाएं हृदय पर अमिट छाप छोड़ती हैं ।
विदित का अर्थ ही विद्वान है अतः इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि इस साझा काव्य संकलन विदित में सम्मिलित सभी रचनाकार व उनकी रचनाओं को साहित्य जगत में यथोचित स्थान प्राप्त होगा। यह मुझे पूर्ण विश्वास है।अंत में मैं इंकलाब प्रकाशन के सरल स्वभाव के धनी श्री सागर यादव जी को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने मुझे इस कार्य के योग्य समझा तथा इस साझा काव्य संकलन की जिम्मेदारी दी। मैं ये तो नहीं जानता कि यह साझा काव्य संकलन "विदित" किस सफलता की ऊंचाई तक पहुंचेगा पर इस काव्य संकलन की रचनाओं के साथ जो स्नेहील संबंध बने वो अत्यधिक सुखद है।
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