Sanjay Agarwala
Description
"काश मैं पक्षी बन जाती, उन्मुक्त गगन में विचरण कर पाती"
--- यह पंक्ति नारी जीवन की उस व्यथा को उजागर करती है, जहां वह खुद को न जाने कितने बंधनों में
...
बंधा हुआ पाती है। सामाजिक मान्यताओं और थोपी गई परंपराओं को ढोते - ढोते उसका अपना अस्तित्व पूरी तरह से कब नष्ट हो जाता है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। जिस देश में नारी कभी देवी समान पूजनीय मानी जाती थी, उसी देश में आज उसका हर ओर अपमान हो रहा है, वह सिर्फ भोग्य की वस्तु बनकर रह गई है। मां, बहन, पत्नी, बेटी बनकर न जाने कितनी भूमिकाओं को एक साथ निभाने वाली सृष्टि की इस जन्मदात्री को आज कुचला, नोचा, खसोटा जा रहा है। समाज के प्रति उसके योगदान को नकार कर लोग तरह - तरह की लांछनाएं लगाने के लिए ही तैयार रहते हैं। अरे ये भी तो सोचिए कि जिस आजाद जीवन की कल्पना पुरुष वर्ग ने की होगी, वैसी ही आजादी तो स्त्रियों के पल्ले भी पड़नी ही चाहिए थी, परन्तु समाज की दोहरी दृष्टि ही ऐसी है जिसमें पुरुषों के लिए कोई बंदिशे ही नहीं, सारे संस्कारों को वहन करने का ठेका जैसे स्त्रियों ने ही ले रखा है। कभी सोचिए, आखिर उसके भी तो कुछ सपने होंगे, उसे भी ख्वाब देखने का अधिकार तो है, उसे भी वह पतंग बनना है जो आकाश चूम सके, पर डोर को संभालने के बजाय उस डोर को ही काट दिया जाता है। अपने पंखों में हौसलों का उड़ान भरकर उसे भी उन्मुक्त रूप से विचरण करने दिया जाए। जब समानता का भाव अपनाकर नर नारी को एक जैसे सारे अधिकार प्राप्त होंगे तभी एक सुंदर संसार की कल्पना की जा सकती है ।
धन्यवाद।
संजय अग्रवाला
संपादक
जलपाईगुड़ी
04/10/2020
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