Trilochan
Description
पिछले कुछ वर्षों में हिंदी कविता के परिदृश्य में त्रिलोचनजी की कविता का महत्त्व असाधारण रूप से बढ़ा है । यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इस महत्ता की स्वीकृति
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में पेशेवर साहित्य मर्मज्ञों और तथाकथित अकादमियों का योगदान न के बराबर रहा है । अगर पिछले कुछ वर्षों की लघु-पत्रिकाएँ उठाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट लगेगा कि युवा कवियों ने अपने समय की सांस्कृतिक जड़ता के खिलाफ त्रिलोचनजी की रचनाशीलता में एक नई ताजगी और ऊर्जा का अनुभव किया है, अपने समय की रचनात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए उनकी रचनाएँ एक योद्धा के रूप में उनके सामने उभरीं । तुम्हें सौंपता हूँ उनकी कविताओं का आठवाँ संग्रह है, जिसमें उनकी सन् 1935 से 83 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएँ शामिल हैं । इतने लम्बे कालक्रम में बिखरी इन कविताओं में आप कवि के रचनात्मक विकास की अनेक मंजिलों से साक्षात्कार करेंगे । वास्तव में त्रिलोचनजी की कविताएँ दुखों और विपदाओं के अपार समुद्र में मानवीय सौंदर्य, प्रेम, आशा और स्वप्न का एक ऐसा घनीभूत पुँज हैं जो हमारे भीतर जीवन के प्रति अगाध विश्वास जगाता है । छोटी-बड़ी इक्यासी कविताओं का यह संग्रह कवि के व्यक्तित्व के कुछ ऐसे आयामों को भी सामने लाएगा, जिनसे हिंदी जगत प्राय: अपरिचित ही रहा है । इस संग्रह के शान्ति पर्व वाले खंड में त्रिलोचनजी के चार काव्य रूपक भी शामिल किए गए हैं जो उन्होंने दूसरे महायुद्ध के नरसंहार की पृष्ठभूमि में लिखे थे । जीवन को विध्वंस की आग में झोंकनेवाली शक्तियों के खिलाफ त्रिलोचनजी की कविताएँ किसी गुरिल्ला सैनिक की तरह हमारे भीतर प्रवेश करती हैं । यह उनकी कविताओं का ऐसा प्रतिनिधि संग्रह है जिसमें पूर्व संकलनों की कोई कविता भरसक नहीं आने पाई है ।
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