Harish Pathak
Description
सच कितने भी पहरों में कैद हो; अँधेरे की कितनी भी परतें उसे दबाएँ; पर उसका विकिरण; उसका तेज सबको चीरकर बाहर आ ही जाता है; सबसे ऊपर; सबसे अलग एक सच वह ह
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ै; जो अक्षरों के साथ कागज पर उतरता है। एक सच वह भी है; जो अक्षरों से दूर चुपके से खड़ा होता है। यही चुप-चुप खड़ा सच हमें अहसास कराता है कि धूप चाहे बदली में ढक गई हो; सूरज चाहे हाँफने लगा हो; धरती बंजर से हरियाली में तब्दील हो गई हो; नीला जल अपनी शिनाख्त खो बैठा हो; हवाओं ने अपनी शीतलता कम कर दी हो; पर मैं वहीं हूँ—अपनी जगह विश्वास के न हिलनेवाले पाँवों पर खड़ा।
प्रस्तुत पुस्तक में कल का सच; आज भी उसी विकृति और विद्रूपता के साथ मौजूद है। आज भी याददाश्त न खोनेवाले दिमागों में दर्ज है कि कैसे एक पवित्र जल में स्नान की चाह रखनेवाली महारानी को देखने उमड़ी भीड़ पचपन लोगों की जल-समाधि ले बैठी थी; कैसे मृत घोषित कर दिया गया एक संगीतकार आज भी अपनी धुनें बिखेर रहा है; कि गुंडे आज भी अखबारों और छोटे परदे पर रोज-रोज जगह पा रहे हैं; कि श्वसुर को मात देनेवाला एक दामाद वक्त से ही मात खा बैठा; कि हत्यारों की कहानी गढ़ते-गढ़ते बीहड़ों के प्रतिनायक जीवन के बीहड़ में आज कितने लाचार और पस्त हैं।
ये रपटें;जो समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं—यह बताने में पूरी तरह सक्षम हैं कि देश; काल और मौसम के बदलने से न तो जीवन मरता है; न सच मिटता है। मनोरंजक; ज्ञानपरक एवं कौतूहलपूर्ण रचनाओं का संग्रह है— त्रिकोण के तीनों कोण।
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Genres
Literary Fiction
Tags
Fiction
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Prabhat Prakashan
Month-Year
Jan, 2010
ISBN
ISBN-13: 9788173157509
ISBN-10: 8173157502
Language
Hindi
No. of Pages
224
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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