Jaishankar Prasad
Description
प्रसादजी के नाटकों में स्कंदगुप्त का विशिष्ट स्थान है। इसका कथानक यद्यपि उनके अन्य नाटकों के समान ऐतिहासिक ही है लेकिन संघर्ष और अंतर्द्वन्द्व की अवता
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रणा पहली बार इसी नाटक में हुई है। प्रसादजी ने यहाँ ऐतिहासिक तथा राजनैतिक घटनाओं का योग पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन-घटनाओं से किया है और इस प्रकार सारा नाटक दो स्तरों पर चलता है। इससे न केवल नाटक में जबर्दस्त अंतर्द्वन्द्व पैदा हुआ है बल्कि पात्रा भी अधिक मानवीय होकर उभरे हैं, उनका स्वतंत्रा अस्तित्व विकसित हो सका हैं आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में ‘चरित्रा-निर्माण में मानव स्वभाव का सहज और कलात्मक प्रदर्शन हुआ है।’ विजया तथा देवसेना के चरित्रा-निर्माण में यह विशेषता द्रष्टव्य है। इन दोनों चरित्रों में प्रसादजी का कविसुलभ व्यक्तित्व प्रतिफलित हुआ है जिसके कारण ये दोनों चरित्रा हमारे मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। पुरुष पात्रों में स्कंदगुप्त, जो नाटक का नायक भी है, इतने सशक्त रूप में सामने आता है कि उसे भुला पाना सम्भव नहीं होता।
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