Chandrakant Jawale
Description
अन्गिनत आकाश गंगाओ ं से समृद्ध हमारा बं्रम्ह्मडं नव निर्माण और
विलय, इन परस्पर विरोधी क्रियाओ ं म े सदैव सक्रिय रहता है। कही
जीवन के शुरवाती निर्मा
...
ण के संकेत किसी दूरस्थित आकाश गंगा
मे उसके सूर्य मंण्डल के चक्कर काटते हुये नये नवेले ग्रह पर
मिलत े है, तो कही अत्यंत विकसित बुद्धि़ मान प्रजाती से समृद्ध ग्रह
अपनी आयु खत्म होने की वजह से प्रलय और विनाश की कगार
पर आकर अंतिम विध्वंस का सामना करता है।
समस्त बं्रम्ह्मंड मे कही ना कही उत्पत्ति और विलय का
यह अनतं मजं र निरंतर चलताही रहता है। हिंदू मान्यताओ ं के
अनुसार सृष्टी पर निर्मित हर एक निर्जीव वस्तु और सजीव प्रजाती,
इनका आपस म े तानाबाना इस कदर है,कि कुछ मामलो ं म े मात्र
सुक्ष्म कण से भी कम बदलाव लाने से जीवन के समीकरण बिछड़
जाते हैं,जैसे हमारे जीन्स के अत्यंत सुक्ष्म कण डी.एन.ए. इसमे
बदलाव किये जाये ं तो आन े वाली समस्त नयी पीढ़ी मं े उसके
विचित्र परिणाम देखने मिलेगं े।इसके विपरीत जीवनमे ं कभी-कभी
अमुलाग्र बदल लाने के पश्चात ही अच्छा जीवन संभव होता है।जैसे
की जब तक सजीव प्राणी अपनी मानसिकताआें मे अच्छे अमुलाग्र
बदलाव न लाएं तब तक उसे अपने जीवन मे अच्छे परिणाम देखने
नही मिलते।
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Genres
No genres specified
Tags
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Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Onlinegatha
Month-Year
May, 2016
ISBN
ISBN-13: 9789385818578
ISBN-10: 9385818570
Language
Hindi
No. of Pages
259
Format
Paperback
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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