प्रशांत ‘बेबार’
Description
दरीचे | Dareeche जिस तरह दरीचे के मानी हैं - झरोखे, ठीक उसी प्रकार इस किताब की सभी नज़्में किसी न किसी झरोखे से झाँक रही हैं। कुछ झरोखे (दरीचे) चैन-ओ-
...
सुकून की ओर खुलते हैं तो कुछ टीस की जानिब। कुछ नज़्में रूह को झकझोर देती है तो कुछ मन को तृप्त कर देती हैं। मज़े की बात ये है कि पूरी किताब में दरीचे नाम से कोई भी नज़्म मौजूद नहीं है बल्कि ज़िन्दगी के अलग-अलग एहसासों के झरोखे हैं, जिनसे नज़्में अपने मिज़ाज के अनुसार झाँक रहीं हैं। कुछ नज़्में माँ के साथ होने जैसा सम्पूर्ण अहसास देती हैं तो कुछ दुनियादारी के मामूलीपन की कोफ़्त टटोलती हैं। कुछ नज़्में धुन की अंगुली पकड़ गुनगुनाती मालूम होती हैं वहीं कुछ नज़्में बीज के रूप में और नई नज़्मों को पैदा करती हैं। हर कविता के साथ उसका अंग्रेज़ी तर्जुमा (अनुवाद) भी शामिल है जो ‘दरीचे' की आवाज़ को ज़बानी सरहद के पार ले जाने की कोशिश है।
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Genres
History
Tags
Poetry
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Poetry World Org
Month-Year
Nov, 2020
ISBN
ISBN-13: 9789389959482
ISBN-10: 9389959489
Language
Hindi
No. of Pages
203
Format
Paperback
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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