Mahashweta Devi
Description
यह बिहार के एक गाँव की कहानी है, जो बीसवीं सदी में नहीं, अभी भी मध्ययुग के बीहड़ अँधेरों में जी रहा है और जहाँ आज भी भारत सरकार का नहीं, बल्कि ऊँची जात
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ि के राजपूत मालिकों का प्रभुत्व चलता है । वही निरंकुश यह तय करते हैं कि नीची जातियों के मर्द–औरतों की भूमिका कब ज़रख़रीद ग़ुलाम, कब बँधुआ मज़दूर, कब उजड़े किसान और कब रखैल की होगी । भूमि–अधिपति श्री श्री गणेश है इस बर्बर और हिंस्र व्यवस्था का निरंकुश शासक, जिसकी महिमा का बखान जन्म से लेकर उसके पिताश्री की रखैल और उसकी धाय माता लछिमा के हाथों मारे जाने तक बड़ी सशक्त शैली में किया गया है । लेकिन फिलहाल हारी जाने वाली इस लड़ाई में शामिल लोगों की चित्र–वीथि में हैं हर जगह और हर युग में अत्याचारी के विरुद्ध चिनगारी फूँकने वालों की परंपरा में राँका दुसाधा, गाँधीवादी अभय महतो, नक्सली जुगलकरन और बस्तियों से जंगलों में भागकर आयी अनाम भीड़ । उपन्यास में हरेक की छवि बड़ी ही सहज और सशक्त रंगों में उभारी गयी है । मध्यम वर्ग की नयी पीढ़ी की यौवन पल्लवी शाह की बौनी सहानुभूति पर किया गया कटाक्ष इस उपन्यास के पाठक कभी भूल नहीं पाएँगे । लेकिन बीहड़ अँधेरे में किरण है सरसतिया की आवाज़, जो अपनी कोख से राँका दुसाध जैसी उद्धत संतान को टेर रही है, यही है इस उपन्यास में उपन्यासकार की आस्था का उद्घोष ।
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