Dharikshan Mishra
Description
स्वर्गीय पं. धरीक्षण मिश्र जी तमकुहीराज के बगल के एक गाँव के किसान के पुत्र थे। बनारस के क्वींस कालेज से पढ़ने के बाद, उनका संपर्क तमकुहीराज के राजपुर
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ोहित पं. उमापति द्विवेदी जी और असिस्टेंट मैनेजर बाबू कोदई राय से हुआ। इन दोनों लोगों ने धरीक्षण जी को कविता लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहन दिया। उनकी कविताओं को सुनकर तत्कालीन राजा इंद्रजीत प्रताप बहादुर साही इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने धरीक्षण जी को भोजपुरी में लिखने का परामर्श दिया। इसके पश्चात पं. धरीक्षण मिश्र का मेरे परिवार से अटूट सम्बन्ध बन गया। उनको कोई राजाश्रय नहीं प्राप्त था और न ही वे कोई दरबारी थे, पर उनके बिना राजा साहेब का कोई भी कार्यक्रम पूर्ण नहीं होता था। पं. धरीक्षण मिश्र जी को शिक्षा से बहुत प्रेम था और उन्होंने तमकुहीराज में शिक्षा के उत्थान के लिए राजा साहेब का हमेशा सहयोग और समर्थन किया। राजनीति, शिक्षा, विवाह, ग्राम-जीवन से लेकर समाज के अनेक पहलुओं पर धरीक्षण जी ने बहुत ही सुन्दर काव्य रचना की है। उनकी समग्र रचनाओं को डॉ. वेदप्रकाश पांडेय ने स्व. केदारनाथ मिश्र जी और कवि के परिजनों के सहयोग से चार खण्डों में सम्पादित तथा प्रकाशित करवाया है।
‘शिव जी के खेती’ पं. धरीक्षण मिश्र जी की रचनाओं की पहली पुस्तक थी जो 1977 ई. में प्रकाशित हुई थी। इधर कई वर्षों से इसकी प्रतियाँ उपलब्ध नहीं हैं। अतः मुझे इसके पुनर्प्रकाशन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। आज जब भोजपुरी साहित्य ने अपना एक अंतर्राष्ट्रीय स्थान बना लिया है, तब तमकुहीराज के उस महान कवि को पुनः पाठकों के समक्ष लाने का ‘शिव जी के खेती’ के पुनर्प्रकाशन के अतिरिक्त मुझे और कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। इस ग्रन्थ के पुनर्प्रकाशन को संभव करने के लिए जिन महानुभावों ने मुझे प्रोत्साहित किया है उनमें आदरणीय डॉ. वेदप्रकाश पांडेय जी प्रमुख हैं। प्राचार्य डॉ. वेदप्रकाश पांडेय का कविवर पं. धरीक्षण मिश्र के प्रति प्रेम और उनके लिए किया गया कार्य स्तुत्य है। दुःख है कि इस पुस्तक का प्रकाशन पं. केदारनाथ मिश्र के जीवनकाल में नहीं हो सका। पं. धरीक्षण मिश्र जी के पौत्र श्री कैलाशनाथ मिश्र एवं प्रपौत्र डॉ. विद्याभास्कर जी को हार्दिक धन्यवाद कि उन्होंने इस कार्य में सहयोग किया। इस कार्य में मेरे पिताजी श्री राजेश्वर प्रताप साही और चाचा न्यायमूर्ति अमरेश्वर प्रताप साही का आशीर्वाद और प्रोत्साहन मेरा सबसे बड़ा बल है। उनके प्रति मेरा विनम्र आभार। - डॉ. वैदुर्य प्रताप साही
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