Renu ‘Rajvanshi’ Gupta
Description
समय कविता को सँवारने में लगा रहता है। कवि की आयु के साथ-साथ कविता की आयु भी बढ़ती है। उसके कोष में जीवन के कठोर धरातल के अनुभव बढ़ जाते हैं, दार्शनिक
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स्तर पर भी वैचारिक परिपक्वता बढ़ती है। कविता की नायिका अब स्वप्नों की दुनिया से नीचे उतरकर जीवन के पथरीले प्रांगण में प्रविष्ट हो जाती है। वह नायक के साथ केवल प्रेम की पींगे ही नहीं बढ़ाती है...वाद भी करती है, संघर्ष भी करती है और कभी आँसू भी बहाती है। दो अनजान प्राणी अनजान धरा पर उगे दांपत्य के पेड़ को सींचने एवं खाद-पानी देने के साथ-साथ समय की कड़ी धूप, आँधी से बचाने में अधिक ऊर्जा व्यय करते हैं।
अपनी जमीन को मजबूत एवं मिट्टी को उपजाऊ बनाने के प्रयास कविताओं में स्पष्ट दिखाई देते हैं। कविता में प्रश्न अधिक दिखाई देते हैं, क्योंकि कवि स्वयं प्रश्नों के उत्तर खोज रहा होता है। अब भाषा संयमित एवं परिपक्व होने लगती है।
कवि प्रौढ होता है तो रचनाएँ भी प्रौढ आकार लेने लगती हैं। अब कविता की परिधि परिवार से बाहर निकलकर समाज, राष्ट्र, प्रकृति या समय-काल की ओर अग्रसर होती है। उसकी दृष्टि प्राकृतिक सुंदरता एवं प्रकृति में निहित दिव्यता या विकरालता की ओर पड़ती है। कवि समाज की विसंगतियों की ओर गौर करता है एवं राष्ट्र के लिए कुछ करने के लिए संकल्पित होता है। रचनाएँ लंबी होती हैं—कवि के साथ विस्तार चाहती हैं—अब प्रश्नों के साथ-साथ समाधान भी खोजे जाते हैं। रचनाएँ सापेक्ष से निरपेक्ष की ओर उन्मुख होती हैं।
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