Prof. Manjula Rana
Description
शुक्ल जी की आलोचक दृष्टि रचनाओं के भीतर गुज़रने का एक उपक्रम है। रचना की केन्द्रीय संवेदना को समझना उनके आलोचना-कर्म का प्रमुख धर्म रहा है। यह उनका अप
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ना वैशिष्ट्य है कि आलोचक के रूप में उनके द्वारा रचना के साथ न्याय किया गया है। नये तथा पुराने सभी रचनाकारों ने उनकी बेबाक टिप्पणियों की सदैव प्रशंसा ही नहीं की बल्कि मुक्त कण्ठ से अपनी स्वीकारोक्ति भी दी है। मेरी साहित्यिक अभिरुचि में आचार्य शुक्ल के इसी शास्त्रीय चिन्तन का अनुनाद है। आचार्य शुक्ल को समझने का तात्पर्य भारतीय आलोचना पद्धति को आत्मसात् करना है। इस पुस्तक में उनकी आलोचनात्मक दृष्टि के अनुरूप सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचना को मुख्य प्रतिपाद्य बनाया गया है। विद्यार्थियों के लिए शुक्ल जी को जानना इस रूप में अनिवार्य है कि उनके बिना साहित्य के विद्यार्थी को रचनाकर्म से जुड़ी किसी भी विधा को समझने में जिस तीक्ष्ण दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह उससे सर्वथा वंचित रह जाता है। इसी आवश्यकता को देखते हुए मैंने शुक्ल जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ-साथ उनकी साहित्यिक संवेदना को विशद रूप से वर्णित किया है। रस-सिद्धान्त और साधारणीकरण के विवेचन में शुक्ल जी जैसा कोई दूसरा नहीं है। भक्ति की बात हो या कविता के कलेवर को जानने की बात, सब में उनके गम्भीर्य और सपाटबयानी से विषय की समझ को देखा जा सकता है। वास्तव में शुक्ल जी भारतीय मनीषा की पहचान हैं। युगों-युगों तक उनके द्वारा स्थापित मान्यताओं से हम उनके ज्ञान एवं मूल्यपरक साहित्य को समझते रहेंगे और यही उनके कृतित्व की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। मेरी साहित्यिक अभिरुचि का मुख्य ध्येय साहित्य को जीवन और चेतना से सम्बद्ध करना है और इस प्रक्रिया में आचार्य शुक्ल का प्रभाव बुनियाद की सुदृढ़ नींव के समान है। मेरा विनम्र आग्रह है कि आलोचना से ही साहित्य का वास्तविक सौन्दर्य प्रकट होता है। इस शृंखला में मेरे इस प्रयत्न से यदि साहित्य मर्मज्ञ कुछ भी नवीन ग्रहण कर सकें तो मैं अपने परिश्रम को सफल मानूँगी। -प्रो. मंजुला राणा संयोजक एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग हे.न.ब. गढ़वाल (केन्द्रीय) विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल)
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Criticism & Theory
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Vāṇī Prakāśana
Month-Year
Sep, 2020
ISBN
ISBN-13: 9789388434379
ISBN-10: 9388434374
Language
Hindi
No. of Pages
216
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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