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उपन्यासकार समाज के विकास का आधार प्रेम को बनाना चाहता है, किन्तु रूढ़िवाद व हठधर्मिता के चलते भावना में आसानी से प्रवाहित हो जाने वाली नारी जिसका परिणा
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म उसे सामाजिक उपेक्षा, असुरक्षा और कई बार जान देकर चुकाना पड़ता है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उपन्यास के नायक अनंत को अपना पूरा जीवन नारी जगत की सेवा, सुरक्षा सम्मान और स्वाभिमान की प्राप्ति के लिए लगा देना पड़ता है जिसकी प्रेरणा कभी उसे माँ तो कभी सहचरी बनते - बनते रह गयी नेहा से मिलती है। धर्मवाद का विरोध करने वाला अनंत एक ही छत के नीचे रहने मुस्लिम लड़की नेहा के प्रेम में पागल हो उठता है और तब उसे आभास होता है यह समाज प्रेम का कितना बड़ा विरोधी है, नेहा को खोने के बाद महिलाओं के प्रति व समाज के प्रति जागरूक होकर वह समाज सेवी बन जाता है और समाज को अपना जीवन सौंप देता है।
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