Vaibhav Singh
Description
टैगोर के उपन्यास समकालीन विषयों को साहस तथा सूक्ष्म अन्वेषण वृत्ति के साथ चित्रित करते थे और यह पुस्तक उपन्यासों में मौजूद इसी गहन सामाजिक यथार्थवाद त
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था ऐतिहासिक जागरूकता को सामने लाती है। इस प्रकार टैगोर की उस प्रचलित बद्धमूल छवि को प्रश्नांकित करती है जिसमें उन्हें केवल ऐसे कवि के रूप में देखा गया जो अमूर्त आध्यात्मिकता तथा बांग्ला ग्राम्य प्रकृति के सौन्दर्य तक सीमित है। वास्तव में टैगोर एक विराट प्रेरणापुंज की तरह हैं जिनके उपन्यासों का वर्तमान में पुनःपाठ आवश्यक है। यह अकादमिक पुनःपाठ न केवल बांग्ला भाषा में साहित्यिक आलोचना की नवीन प्रवृत्तियों के विकास को सम्भव बनाता है बल्कि यह हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भी साहित्य-आलोचना के विकास में प्रेरक सिद्ध हो सकता है।
-प्रो. राधा चक्रवर्ती
टैगोर साहित्य की प्रख्यात अध्येता और अंग्रेज़ी आलोचक
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की औपन्यासिक दृष्टि और लोक विस्मयकारी ढंग से, हमारे बेहद आक्रामक वर्तमान की अनेक राजनीतिक-सामाजिक आध्यात्मिक वृत्तियों के पूर्वाभास की रण और रंगभूमि है। वैभव सिंह ने गम्भीरता और ज़िम्मेदारी से समझ और संवेदना से इस रवीन्द्र-लोक का गहरा सार्थक और प्रासंगिक विश्लेषण किया है। यह हिन्दी आलोचना को व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य देने का एक मूल्यवान प्रयत्न है।
-अशोक वाजपेयी
वरिष्ठ साहित्यकार
इस पुस्तक में गोरा, घरे बाइरे, चतुरंग आदि उपन्यासों पर चर्चा करते हुए पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं से उस युग का आलोचनात्मक संवाद सामने आया है। वैभव सिंह ने यह भी उजागर किया है कि क्यों रवीन्द्रनाथ का संवेदनशील अन्तर्जगत कविता की तुलना में उपन्यास विधा में अधिक विविधवर्णी जीवन चित्रों के साथ है, वे अपने से बाहर निकलकर स्त्री को पढ़ते हैं और उपेक्षित चरित्रों को वाणी देते हैं। हालाँकि उनकी संगीतमय वैश्विकता की तान कहीं नहीं टूटती। रवीन्द्रनाथ के उपन्यासों पर लिखते हुए उन्होंने उनके युग के साहित्यिक स्थानों, धार्मिक-सामाजिक आन्दोलनों और राष्ट्रीय जागरण की समस्याओं की विस्तृत छानबीन की है और इस तरह हिन्दी आलोचना को समृद्ध किया है।
-प्रो. शंभुनाथ
वरिष्ठ आलोचक-चिन्तक
रवीन्द्रनाथ के उपन्यासों का आत्मीय भाष्य करने का उपक्रम वैभव सिंह की इस रचना को विशिष्ट बनाता है। इस कृति से गुजरने के बाद सुधी पाठक कह सकेंगे कि अब वे रवीन्द्रनाथ को नये सिरे से जानने लगे हैं।
- प्रो. अभय कुमार दुबे
प्रतिष्ठित समाजवैज्ञानिक
रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) के उपन्यासों का विस्तृत विश्लेषण अभी तक हिन्दी आलोचना में नहीं हुआ है, हालाँकि उनके उपन्यासों के अनुवाद अवश्य हिन्दी के ख्यातनाम लेखकों के द्वारा किये गये हैं। उन पर बांग्ला व हिन्दी भाषा में कई फ़िल्मों का निर्माण भी हुआ है। यह पुस्तक तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की आवश्यकताओं तथा सामान्य पाठकों की टैगोर के उपन्यासों में रुचि को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी है। वास्तव में उपन्यास लेखन एक बृहत् सभ्यतागत कर्म है जिसमें सामाजिक दृष्टियों व विचारधाराओं के परस्पर टकराव उसकी कथावस्तु को साकार करते हैं। इस कसौटी पर टैगोर के उपन्यास पाठकों व उपन्यास-समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते रहे हैं। वे सपाट ढंग से किसी सामाजिक उद्देश्य या सामाजिक आदर्श की लक्ष्मण-रेखा तक सीमित रह जाने के स्थान पर बड़े धरातल पर मानवीय स्थितियों तथा राष्ट्रीय सामाजिक आन्दोलनों में मौजूद विभिन्न वैचारिक तनाव-टकरावों को पेश करते हैं। जिस प्रकार वे कविता में मानते हैं- 'आमि एड पृथीवीर कवि' (मैं इस पृथ्वी का कवि हूँ), उसी प्रकार वह उपन्यास में भी पृथ्वी की, अर्थात सामाजिक हलचलों व उधेड़बुन को आख्यान का आधार बनाते हैं। उनके उपन्यासों का विवेचन करते हुए यह बात भी सामने आती है कि पूरबी आध्यात्मिकता, सन्त-परम्परा या रहस्यवाद से सम्बद्ध उनकी छवि उनके उपन्यासों को समझने में विशेष सहायक नहीं है। फ़क़ीरों जैसे उनके लम्बे चोगे (गाउन), श्वेत-धवल लम्बी दाढ़ी और योगियों जैसी शान्त मुद्रा से मन में जो छवि बनती है, उनका उपन्यासकार रूप उससे अलग है। वहाँ उन्हें हम एक अधिक सजग तर्कवादी, यथार्थवादी कलाकार तथा अनुशासित गद्यकार के रूप में पाते हैं जिसके लिए संसार को कोई विषय साहित्य में वर्ज्य या उपेक्षणीय नहीं है। वहाँ जीवन के अमूर्तनों में ले जाने वाला रहस्यवाद नहीं, कठोर ज़मीन से जुड़ा यथार्थवाद है।
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