Satish Dhar
Description
"कश्मीर की आदिकवयित्री शैवयोगिनी माता लल्लेश्वरी को परमगुरु मानकर उन्हें ओंकार की भाँति हृदय में स्थापित करनेवाली; अपने गुरु और पिता पंडित माधव जू धर
...
को शिवस्वरूप माननेवाली माताश्री रूपभवानी वे शक्तिरूपा हैं; जिन्होंने कश्मीर की उस आध्यात्मिक परंपरा को परिपुष्ट किया; जो भारत की सभ्यता का अविच्छिन्न अंग है। यह पुस्तक इसी दार्शनिक स्वरूप और उसकी दिशा को रेखांकित करती है।
माता रूपभवानी ने शस्त्र और शास्त्र की सार्थकता पर जो चिंतन किया है; उसे उनके ‘वाखों’ में अभिव्यक्ति मिली है। ये दोनों ही अंदर के खालीपन को भरने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं; लेकिन उस परब्रह्म की सत्ता का बोध हो तो फिर न शस्त्र की आवश्यकता रहती है; न शास्त्र की।
कश्मीर की समृद्ध संत-परंपरा के गौरवमयी इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है माता श्रीरूपभवानी का अवतरण। इस महान् तपस्विनी ने विभिन्न स्थलों पर 50 वर्ष तक तपस्या के पश्चात् अपने भक्तों को निर्वाण का रहस्य अपने उपदेशों के माध्यम से समझाया। ये उपदेश साधना की राह में आगे बढ़ने के लिए आज भी साधक को निरंतर प्रेरित करते हैं।
आशा है; माता श्रीरूपभवानी के उपदेशों को समझने और उनका अनुसरण करने की दिशा में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी।
—डॉ. दिलीप कौल" "सतीश धर
23 अगस्त; 1951 को श्रीनगर (कश्मीर) में जन्म। प्रारंभिक शिक्षा हिमाचल में। हिमाचल प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में नौकरी की; उपनिदेशक के पद से सेवानिवृत्ति। मूलतः कवि—तीन काव्य-संग्रह; ‘कल की बात’; ‘सलमा खातून नदी बन गई’ और ‘प्रथम पंक्ति के लोग’ प्रकाशित। वर्ष 2000 में माता श्री रूपभवानी के वाखों के अनुवाद और कश्मीर के धर पंडितों की वंशावली पर आधारित पुस्तक ‘कौन जाने तेरा स्वभाव’ श्री अलखसाहिबा ट्रस्ट; जम्मू द्वारा प्रकाशित।"
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Genres
Literary Fiction
Tags
Fiction
Mystery & Detective
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Prabhat Prakashan
Month-Year
Jan, 2018
ISBN
ISBN-13: 9789352668373
ISBN-10: 9352668375
Language
Hindi
No. of Pages
200
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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