Krishna Kumar
Description
शिक्षा की बहसें प्रायः सरकारी नीतिपत्रों में दिए गए वायदों, घिसे-पीटे आदर्श वाक्यों या फिर प्राचीन व्यवस्था के मिथकों के इर्द-गिर्द घुमती हैं ! स्कूल
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और कॉलेजों की दैनिक चर्चा हो या शिक्षाशास्त्र की पाठ्य पुस्तकें-दोनों ही बच्चे के जीवित संसार और समाज के व्यापक संघर्षों से बहुत दूर जा पड़ी हैं ! इस पुस्तक ने शिक्षा की बहसों को एक नई शब्दावली ही नहीं, एक नई अर्थवत्ता भी दी है ! कोई आश्चर्य नहीं कि यह पुस्तक उमस के बीच तजि हवा के झोंके का पर्याय बन सकने की क्षमता रखती है ! शिक्षा की सच्चाई को यह कृति राज्य-व्यवस्था और सामाजिक जीवन की जटिल बुनावट के बीच ढूंढती है ! इसे पढ़ते हुए हम बच्चों के प्रति अपनी स्वाभाविक चिंता को एक राजनैतिक आधार और वैज्ञानिक अभिव्यक्ति पाते हुए देखते हैं ! शिक्षा को कृष्ण कुमार ने बहुत व्यपक अर्थ में लिया है, जिसमें बच्चों के लालन-पालन से लेकर उन्हें सामाजिक मुल्योबोध देनेवाली अनेक सूक्ष्म प्रक्रियाएँ शामिल हैं ! जाहिर है, इस पुस्तक का पाठक वर्ग शिक्षा के नीतिकारों, प्रशिक्षको और छात्रों तक सीमित नहीं है ! उसमें ऐसे सभी माता-पिता भी शामिल हैं जो अपनी संतान के भविष्य को समाज की संरचना और राजनीती के चरित्र से अलग नहीं मानते !
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