Arunima Sharma
Description
साधारण भाषा में कहें तो पाँच वि, यानी विरह, विछोह, विराग, विद्रोह या वियोगावस्था में मन की भावनाएँ जब लयबद्ध होकर प्रस्फुटित होती हैं तो कविता अवतरित
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होती है। प्रतिदिन के ऊहापोह वाली दिनचर्या में मुझे इतनी फुरसत तो नहीं मिलती कि मैं कुछ लिखूँ या पढ़ूँ, पर जब भी ज्यादा एकाकीपन महसूस होता है या मन खुश होता है तो उन भावनाओं को मैं अवश्य ही शब्दों का जामा पहना देती हूँ। तब 'वक्त के आईने में जिंदगी', 'कौन आया था', 'आत्मचिंतन' जैसी गूढ़ एवं दार्शनिकता से भरी कविताओं की रचना होती है। मेरी कुछ कविताएँ, जैसे 'पेड़ लगाओ, शहर बचाओ', 'पनिहारिन', 'छात्र या बेटियाँ' किसी के आग्रह पर लिखी गई हैं। इसी तरह 'गरमी का मौसम', 'समय', 'कुछ लिखने को है', 'घना कोहरा', 'तुम आ जाओ', 'फेसबुक', 'कश्मीर', 'वक्त नहीं है', 'सहयात्री एवं झाँसी की रानी' इत्यादि की रचना भी परिस्थितिजन्य हुई है। 'गंगा' तो गंगा की उद्दाम और शांत लहरों को देखकर लिखी गई है। यह छोटी सी भूमिका है मेरी पुष्पांजलि की विभिन्न कडि़यों की, लेकिन मेरी अपने सुधी पाठकों से विनम्र आग्रह है कि वे मेरे एक-एक पुष्प के मकरंद का रसास्वादन यह जानते हुए करें कि लेखिका न तो साहित्य की प्राध्यापिका है और न ही उसमें पी-एच.डी.। मैं मूलतः विज्ञान की छात्रा रही हूँ, लेकिन कला एवं साहित्य से अपने विशेष जुड़ाव को छिपा भी नहीं पाती हूँ। -अरुणिमा शर्मा
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