Narendra Kumar
Description
जीवन के इस दौर में हम लोग इतना आगे निकल आए कि पीछे मुड़ कर देखने की कोशिश ही नहीं करते मगर इसी दौर में हम लोग बहुत कुछ छोड़ आए ।
हम बचपन, जवानी, घर, पर
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िवार, भरोसा, रिश्ता, चेहरा सब कुछ छोड़ आए मगर ये सब आज भी हमें पुकारते रहते हैं लेकिन इन पर हम गौर नहीं कर पाते ।
गुजरा हुआ बचपन पुकारेगा तुम्हें
घर में लगा दर्पण पुकारेगा तुम्हें
हंसता-खेलता हुआ आंगन पुकारेगा तुम्हें
बहनों की राखी का सावन पुकारेगा तुम्हें ।
इसी उद्देश्य से मैंने अपनी पहली पुस्तक “पुकारेगा तुम्हें“ में चुनिंदा रचनाओं का संकलन तैयार किया है इस पुस्तक में कविताएं, गीत, गजलें एवं चुनिंदा शायरी का संकलन बोलचाल की भाषा में किया गया है जिसमें हिंदुस्तान की हर एक आवाज को लिखने की कोशिश किया है ।
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