Narendra Mishra
Description
‘छोटे मुँह बड़ी बात’ कहनेवाली कहानी के बारे में प्रायः ‘बड़े मुँह छोटी बात’ कही जाती है। कहानी का दुर्भाग्य है कि यह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है औ
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र शिल्प के रूप में आलोचित होती है। कहानी में अनेक आलोचकों की दिलचस्पी इतनी ही है कि यह साहित्य का एक रूप है। इसलिए कहानी की ओर ध्यान जाता है—या तो इतिहास लिखते समय या फिर साहित्यिक रूपों का शास्त्रीय विवेचन करते समय। जहाँ साहित्य के मान और मूल्यों की चर्चा होती है, वहाँ कहानियों को प्रायः हाशिए पर रखा जाता है। ‘प्रतिनिधि महिला कहानियाँ’ आलोचकों की इस धारणा को निर्मूल सिद्ध करती हैं। यदि आप मन्नू भंडारी, मालती जोशी, चित्रा मुद्गल, मृदुला सिन्हा, मृदुला गर्ग, सूर्यबाला, राजी सेठ, चंद्रकांता, मेहरुन्निसा परवेज एवं विद्या बिंदु सिंह की कहानियों को पढ़ते हैं तो आपको न केवल 21वीं सदी की कहानियों का आस्वाद प्राप्त होता है, वरन् 20वीं सदी की कहानियों के रचनाविधान का अक्स भी परिलक्षित होता है। इस संकलन में एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ कहानियों को माला के रूप में गूँथा गया है। इन कहानियों के बगैर हिंदी कहानी का इतिहास कभी पूरा नहीं हो सकता। अपने इस नवीनतम उपन्यास की अंतिम रूप से संशोधित पांडुलिपि को मुझे क्षमा कौल ने कई किश्तों में सुनाया।एक महत्त्वपूर्ण मूर्तिशिल्पी स्त्री के जीवन-संघर्षों, सृजन की प्रक्रियाओं, उसके सपनों, उपलब्धियों, उसकी निश्छलताओं तथा उसके प्रेम, शोषण, जीवन दर्शन, बीहड़ यात्राओं, हताशाओं, टूटन एवं उसके हृदयविदारक अंत और निष्कर्ष पर यह एक विलक्षण उपन्यास बन पड़ा है।कश्मीर की इस मूर्तिशिल्पी के जीवन में कैसे जिहादी आतंक भयंकर उथल-पुथल मचाता है और चित्त में प्रवेश कर बिना गोली इत्यादि के नष्ट कर डालता है। व्यक्ति, समाज और परिवेश के गहन मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में सभी चरित्र इतने जटिल हैं कि उनकी जटिलताओं की तमाम तहें और उनकी आनुषंगिक कथाएँ व अंतर्कथाएँ उपन्यासकार ने कैसे एक कुशल सूत्रधार की तरह समायोजित की हैं कि मैं आश्चर्यचकित रह गया।अंत तक आते-आते मार्मिकता से इतना विह्वल हुआ कि बिलख-बिलख उठा।मुझे विश्वास है कि ‘मूर्ति-भंजन’ अपने संपूर्ण ताने-बाने में कश्मीर की अंतरंग कथा कहता हुआ और जिनोसाइड के अछूते आयामों पर प्रकाश डालता हुआ विशेष कृति के रूप में प्रतिष्ठा पाएगा और एक अनूठा उपन्यास सिद्ध होगा।
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