Nasira Sharma
Description
‘‘मुस्लिम समाज सिर्फ ‘गश्जश्ल’ नहीं है, बल्कि एक ऐसा ‘मर्सिया’ है जो वह अपनी रूढ़िवादिता की कब्र के सिरहाने पढ़ता है। पर उसके साजश् और आवाजश् को कितने ल
...
ोग सुन पाते हैं, और उसका सही दर्द समझते हैं ?’’ लेखिका द्वारा की गई यह टिप्पणी इन कहानियों की पृष्ठभूमि और लेखकीय सरोकार को जिस संजीदगी से संकेतित करती है, कहानियों से गुजश्रने पर हम उसे और अधिक सघन होता हुआ पाते हैं। नासिरा शर्मा नयी पीढ़ी की कथाकार हैं लेकिन जिस अनुभव जगत को उन्होंने अपनी रचनात्मकता के केन्द्र में रखा है, वह उन्हें और उनकी संवेदना को पीढ़ियों और देश-काल के ओर-छोर तक फैला देता है। एक रूढ़िग्रस्त समाज में उसके बुनियादी अर्धांश - नारी जाति की घुटन, बेबसी और मुक्तिकामी छटपटाहट का जैसा चित्रण इन कहानियों में हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है। बल्कि ईमानदारी से स्वीकार किया जाय तो ये कहानियाँ नारी की जातीय त्रासदी का मर्मान्तक दस्तावेजश् हैं, फिर चाहे वह किसी भी सामन्ती समाज में क्यों न हो। दिन-रात टुकड़े-टुकड़े होकर बँटते रहना और दम तोड़ जाना ही जैसे उसकी नियति है। रचना-शिल्प की दृष्टि से भी ये कहानियाँ बेहद सधी हुई हैं। इनसे उद्घाटित होता हुआ यथार्थ अपने आनुभूतिक आवेग के कारण काव्यात्मकता से सराबोर है, यही कारण है कि लेखिका अपनी बात कहने के लिए न तो भाषायी आडम्बर का सहारा लेती है, न किसी अमूर्तन का और न किसी आरोपित प्रयोग और विचार का। उसमें अगर विस्तार भी है तो वह एक त्रासद स्थिति के काल-विस्तार को ही प्रतीकित करता है। कहना न होगा कि नासिरा शर्मा की ये कहानियाँ हमें अपने चरित्रों की तरह गहन अवसाद, छटपटाहट और बदलाव की चेतना से भर जाती हैं।
Read more