Dr. Brijbala Singh
Description
हिन्दी कविता के समकालीन फलक पर गये पाँच दशकों से आच्छादित लीलाधर जगूड़ी की कविताएँ जहाँ एक ओर अपने कथ्य और प्रतीत की यथार्थवादी अभिव्यक्तियों के लिए ज
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ानी-पहचानी जाती हैं, वहीं अपने सर्वथा अलग भाषिक स्थापत्य के लिए भी। हम कह सकते हैं कि आज की कविता को रघुवीर सहाय व केदारनाथ सिंह के बाद धूमिल और जगूड़ी ने गहराई से प्रभावित किया है। परिवर्तन की परम्परा के कवि के रूप में लीलाधर जगूड़ी निरन्तर अपने काव्य संस्कारों को माँजने वाले कवियों में रहे हैं। इसीलिए वे खेल-खेल में भी शब्दों के नये से नये अर्थ के प्रस्तावन के लिए प्रतिश्रुत दिखते हैं। अपनी सुदीर्घ काव्य यात्रा में जगूड़ी की विशेषता यह रही है कि वे विनोद कुमार शुक्ल की तरह ही, अपने ही प्रयुक्त कथन, भाव, बिम्ब या प्रतीक को दुहराने से बचते रहे हैं। यह उनकी मौलिकता का साक्ष्य है। हिन्दी की विदुषी आलोचक बृजबाला सिंह ने लीलाधर जगूड़ी पर केन्द्रित अपनी पुस्तक में जगूड़ी के पाठ्यबल के गुणसूत्र को कवि-जीवन, रचना यात्रा, कविता के उद्गम स्थल, चेतना के शिल्प और लम्बी कविताओं के महाकाव्यात्मक विधान के आलोक में कविता-विवेक के साथ लक्षित-विश्लेषित किया है। -ओम निश्चल
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