डाॅ॰ प्रदीप उपाध्याय
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उन्होंने जीवन में कभी हार नहीं मानी थी।मानी भी थी तो केवल अपनी चट्टी जुबान से और इस वफादार वजन से! वैसे भी जुबान ही थी जिसने उन्हें आज इस मुकाम तक पहु
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ँचाया था। बोलने का ही तो खाते हैं तभी तो शिक्षाविद न होकर भी शिक्षामंत्री बन चुके थे।अब जब योग दिवस मना ही रहे हैं तब उन्हें लगा कि मंत्री पद हथियाने में कभी इतना पसीना नहीं बहाना पड़ा जितना इस भयानक गर्मी में ऊपर से आए फरमान के पालन में योग दिवस के अवसर पर छात्रों, शिक्षकों, जनसामान्य, पत्रकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच चर्बी गलाना पड़ रही थी
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