Shubhangi Bhadbhade
Description
परम हंस, फिर आओ एक आत्मीय निवेदन है — एक शिष्य की अंतरतम पुकार, जो अपने दिव्य गुरु की अनुपस्थिति में भी उनकी उपस्थिति को हर पल जीता है।
शुभांगी भडभड
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े द्वारा रचित यह जीवनी केवल एक संत के जीवन का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा है, जो पाठक को पहले शब्द से अंतिम पंक्ति तक बांधे रखती है। इसमें न केवल परमहंस के जीवन की विलक्षण घटनाओं का चित्रण है, बल्कि उनके विचारों, करुणा और मौन उपदेशों का वह प्रभाव भी है जो आत्मा को भीतर से स्पर्श करता है।
यह पुस्तक उस अलौकिक संबंध की गूंज है, जो एक गुरु और शिष्य के बीच जन्मों से चला आ रहा होता है। “फिर आओ” केवल एक विनती नहीं, बल्कि आत्मा की वह पुकार है जो समय, दूरी और मृत्यु के पार जाती है। यह एक ऐसी चेतना का आह्वान है जो मार्गदर्शन, प्रेम और प्रकाश की प्रतीक है।
परम हंस, फिर आओ में लेखिका ने शब्दों के माध्यम से वह शून्य भरा है, जो एक दिव्य उपस्थिति के चले जाने से उत्पन्न होता है। यह शून्य, यह तड़प, और यह स्मरण—तीनों मिलकर एक ऐसी कृति बनाते हैं, जो पढ़ने वाले के भीतर ध्यान, भक्ति और आत्मबोध की लौ जगा देती है।
यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो जीवन में गुरु की तलाश में हैं, जिन्होंने प्रेम को मौन में महसूस किया है, और जो जानना चाहते हैं कि एक सच्चा संत अपने अनुयायियों के हृदय में कैसे जीवित रहता है।
परम हंस, फिर आओ एक पुस्तक नहीं, एक अनुभव है—जिसे पढ़ा नहीं, जिया जाता है।
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