मोहन राकेश, Mohan Rakesh
Description
'पैर तले की जमीन' चारों ओर के बिखराव, अस्त - व्यस्तता, खालीपन, हड़बड़ाहट और बेचैनी से, अनिश्चितता से आरम्भ होता है जिसे राकेश अब्दुल्ला जैसे पात्र की स
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ृष्टि करके स्थिति का चयन करके और नाट्य-भाषा की बुनावट एवं संवादों की प्रकृति और टकराहट से पैदा करते हैं। शायद चरित्र, भाषा और नाट्य-स्थितियाँ - ये राकेश की नाट्य-रचना के अपने अनुभव को- अन्तर्मन को नाट्यविधा के साँचे में ढालने के चुने हुए अनिवार्य अंग हैं - इन्हीं में उनकी मौलिकता को हर नाटक में पहचाना जा सकता है, एक अजीबो-गरीब स्थिति में सभी पात्र एक स्थान पर इकट्ठे होते हैं - अब्दुल्ला, नियामत, पंडित, झुनझुनवाला, नीरा, गुड्डो दीदी, अयूब - उनका एक साथ इकट्ठे होना उनकी नियति है। वे एक-दूसरे को न जानते हुए भी जानते हैं और सही अर्थों में जानते हुए भी बिलकुल नहीं जानते। 'पानी को बढ़ने दो तुम्हारा मुझे जान लेना जीते रहने से ज्यादा जरूरी है?'...... 'मुझे नहीं लगता कि रुककर भी जान पाऊँगी।' लगभग सभी पात्र इसी मन स्थिति से गुजर रहे हैं। जीना भी चाहते हैं-जीने की संभावना की आशा भी करते हैं और जानना भी चाहते हैं पर जीने और जानने का उनके पास कोई तरीका नहीं है। वे बस घिरे हैं संबंधहीनता से वहम और नफरत से, मूल्यहीनता- अनैतिकता और विकृतियों से, कुंठाओं-ग्रन्थियों से। उनके आस-पास केवल शोर है, उस शोर में छटपटाहट भी है। अपने को व्यक्त करती-सी रीता-एक युवा लड़की कहती है-'मैं जवान हूँ। इसलिए मुझमें अन्त को स्वीकार कर लेने का साहस है। तुम लोग साहसहीन हो। नपुंसक हो।........ अगर तुम लोग अन्दर से बिल्कुल मिट्टी नहीं हो गए हो तो सब अपनी-अपनी इच्छा और अपने चुनाव से अपना अन्त तय करो।'
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