Doodhnath Singh
Description
निराला : आत्महन्ता आस्था- दरअसल एक नये कवि- कथाकार द्वारा एक दूसरे कवि का आत्मीय विश्लेषण है । इसका एक नाम यह भी हो सकता था- पक लेखक की निजी नोट-बुक
...
में एक दूसरा लेखक' । यह पुस्तक लेखक के उन्हीं नोट्स' का क्रमबद्ध रूपान्तरण है उसके निजी आनन्द की अभिव्यक्ति है । लेकिन आनन्द की यह अभिव्यक्ति लेखक के श्रद्धा- विगलित क्षणों की उपज न होकर, उसके दिमाग की तार्किक रस-सिद्धि का परिणाम है; उसके सधे हुए सुर की झंकार है । अत: उसमें एक तर्कपूर्ण निजी शास्त्रीयता भी है । इसीलिए वह मात्र प्रशस्ति-वाचन या निन्दा नहीं है, बल्कि निराला की काव्य-ऊर्जा तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक नया और निजी द्वार है, जिससे जागरूक पाठक और नये आलोचक एक नयी जगह से उस सिंह के दर्शन कर सकें । जब आप इस नये द्वार से प्रवेश करेंगे- तभी समझ सकेंगे कि क्यों निराला दूसरे छायावादी कवियों से विरोधी दिशा के कवि हैं? क्यों उनको बने-बनाये काव्य-सिद्धान्तों में 'फिट-इन' नहीं किया जा सकता? क्यों उनकी रचनात्मकता का अध्ययन करने के लिये काल-क्रम का आधार बेमानी ठहरता है? तब आप उस अँधेरी गुप्ता में बैठी, उन जलती आँखों के सान्द्र प्रकाश का साक्षात्कार कर पायेंगे । इसी साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत है यह पुस्तक - निराला : आत्महन्ता आस्था ।
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Genres
No genres specified
Tags
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Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Lokbharti Prakashan
Month-Year
Sep, 2009
ISBN
ISBN-13: 9788180313196
ISBN-10: 8180313190
Language
Hindi
No. of Pages
280
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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