अमित कुमार
Description
एक घटना या दुर्घटना था, फिर एक गलती या खुद की एक छोटी सी लापरवाही एक इन्सान की पूरी ज़िन्दगी बदल कर रख देती है। उसका भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ पलट
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कर रख देती है। ना ही कुछ कर सकता, ना ही कुछ करने लायक छोड़ती। ये किस्मत एक पल में ही सब कुछ चकनाचूर कर देती है। ये किस्मत एक पल में पूरी ज़िन्दगी बदल देती है। किसी को रोडपति से करोड़पति तो किसी को करोड़पति से रोडपति बनाने में मात्र चन्द पल ही लगाती है। कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ भी। किस तरह एक छोटी से घटना ने ना मेरे Past, Present, Future कैरियर बल्कि मेरी पूरी ज़िन्दगी ही तबाह कर दी न कि बदल दी। अगस्त, 2017 मेरी ज़िन्दगी का सबसे बुरा महीना और साल जिसमें मैंने अपने कैरियर अपने सपने यहाँ तक की मैंने खुद को खो दिया था। अगस्त, 2017 में किस्मत ने मुझे वहाँ पर ले जाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ मुझे सिर्फ और सिर्फ नर्क का एहसास होता था। जहाँ मेरी सोचने समझने की शक्ति ही नष्ट हो चुकी। उसे किस्मत का खेल कहूँ या फिर मेरी खुद की लापरवाही। मुझे अब तक समझ नहीं आ रहा। अगस्त, 2017 मेरे साथ एक ऐसी घटना हुई, जिसमें मैंने अपने शरीर के अहम हिस्से दोनों गुर्दे को खोया बल्कि साथ-साथ अपने शरीर के अहम हिस्से फेफड़े सीधे हाथ के फेफड़े को भी खो दिया। ये एक ऐसी घटना थी जिसने मेरी ज़िन्दगी को पूरी तरह से बदल दिया। मैं अब तक नहीं समझ पा रहा हूँ कि यह भाग्य का लेखा था या मेरी लापरवाही का नतीजा। खैर जो भी था मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए बहुत बुरा वक्त था और सबक था। किस्मत ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन कर एक सबक और ज़िन्दगी के प्रति बड़ा अनुभव मुझे दिया है। ज़ाहिर सी बात है कि आप सबके मन में अब बस एक ही सवाल उठ रहा होगा कि मेरा इस पुस्तक को लिखने का क्या मकसद है और ये सवाल बिल्कुल सही भी है, तो मैं आप लोगों को बता दूूँ कि इस पुस्तक को लिखने और छपवाने का मेरा मकसद सिर्फ यह है कि जो लापरवाही अपने जीवन काल में गुर्दे खराब होने से पहले की चीज़ों को सोचने-समझने में की जिसके कारण मुझे इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। किसी और के साथ ऐसा ना हो और मेरे साथ खराब होने के दौरान वर्ष 2017 से वर्ष 2022 तक इन 04 वर्षों का अनुभव मेरे साथ क्या-क्या हुआ, कैसे-कैसे दिन गुजरे, किन-किन हालातों से गुजरे, कैसी-कैसी सोचे दिल और दिमाग को चैबीसों घंटे घेरे रहती थी। शुरूआती बीमारी में कैसा महसूस होता था, फिर धीरे-धीरे कैसे । Adjust करना सीखा। कैसे लड़ा खुद ‘कैसे लड़ा’ इस बीमारी से। अपना 04 वर्ष का पूरा अनुभव बताऊँगा। तब जो जो मेरे साथ हुआ, कुछ लापरवाहियों के कारण वो भविष्य में किसी और के साथ ना हो और खासतौर पर उनके लिए जो फिलहाल उस Stage से गुजर रहे है, जिससे मैं बाहर आ चुका हूँ।
उनके लिए जो सोचते है कि अब ज़िन्दगी में कुछ नहीं, क्या जो हर वक्त तनाव, चिन्ता, Depression से घिरे रहते हैं, जो ज़िन्दगी से हार मान चुके है। यह बात भी सच है कि जब हमारे साथ अचानक से कोई ऐसी Situation आ जाती है, तो खुद को सम्भाल पाना बहुत मुश्किल होता है। एक इन्सान चाहकर भी कुछ नही कर पाता, जब ऐसे दौर से गुजर रहा होता है या गुजर चुका होता है। मैं अपने खुद के अनुभव से ये बात कहता हूँ कि मेरे दिमाग में हर समय अजीब-अजीब तरह के सवाल उठते थे और ऐसा नहीं है कि अब ये सवाल नहीं उठते बल्कि अब उन सवालों को उन विचारों को शान्त कैसे करने है, जो हर एक वक्त ने मुझे सीखा दिया है। मेरा इस पुस्तक को लिखने का सिर्फ एक मात्र यही मकसद है किस तरह हमारे जीवन में आई बड़ी से बड़ी परेशानियों और मुसीबतों का अपनों के साथ मिलकर उनका सामना करके हँसकर हर परेशानी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, जब अपनों का साथ और हिम्मत हो तो वो ना के बराबर हो जाती है, क्योंकि जो मैं आज जिन्दा हूँ और जो साँसें ले रहा हूँ वो सिर्फ और सिर्फ मेरे परिवार की वजह से खासतौर पर माँ-बाप और बड़े भाई जिन्होंने सब कुछ मुझे जिन्दा रखने पर न्यौछावार कर दिया। तन, मन, धन सब कुछ मुझ पर कुर्बान कर दिया। और मैं आज खुद को एक तरफ से भाग्यशाली इसलिए भी समझता हूँ। आज मेरे पास कुछ ना होकर भी सब कुछ है, क्योंकि मेरे पास एक दूसरे से प्यार करने वाला परिवार है, जो एक दूसरे के सुख-दुःख में कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलते हैं। मेरे पास कुछ न होकर भी सब कुछ है। आज माता-पिताजी, भाई, बहन जो मुझे किसी भी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने देते। मैं अपनी ये पुस्तक अपने परिवार और खासतौर पर अपने बड़े भाई को समर्पित करता हूँ, जिसने मेरा, मेरी हर मुसीबत में हाथ थामें (पकड़े रखा) मुझे कभी भी अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया।
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