Jagdamba Prasad Dixit
Description
मुरदा-घर सामाजिक विसंगतियों और विषमताओं का यथार्थपूर्ण चित्रण है। वर्तमान अर्थव्यवस्था के तहत गाँवों के उजड़ने की प्रक्रिया जैसे-जैसे तेज़ होती गई, महान
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गरों में गंदी बस्तियों और झोपड़-पट्टियों या झुग्गी-झोपड़ियों का उतनी ही तेज़ी से विस्तार होता गया। इन बस्तियों में मानव-जीवन का जो रूप विकसित हुआ, वह काफ़ी विकृत और अमानवीय है। वेश्या-वृत्ति और अपराध-कर्म का यहाँ विशेष रूप से विकास हुआ। मुरदा-घर में झोपड़-पट्टी की वेश्याओं की दयनीय स्थिति का शक्तिशाली चित्रण है। विद्रूप यथार्थ मुरदा-घर के केंद्र में ज़रूर है, लेकिन उपन्यास की मुख्य धारा करुणा और संवेदना की है। विकृत से विकृत स्थितियों से गुज़रते हुए भी उपन्यास के पात्र नितांत मानवीय और संवेदनशील हैं। मुरदा-घर में वर्तमान राज्य-तंत्र के अमानवीय रूप को भी उकेरा गया है। पुलिस-स्टेशन, हवालात, कचहरी, वग़ैरह का जो रूप यहाँ सामने आया है, काफ़ी अमानवीय और नृशंस है। मुरदा-घर आज की हमारी पूरी व्यवस्था पर एक प्रश्न-चिह्न है। जैसा कि एक आलोचक ने कहा है, ‘मुरदा-घर आधुनिक हिंदी उपन्यासों की दुनिया में एक चुनौती है। इसका सामना करना आसान नहीं है।’
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