Dr. Pramod Jain
Description
जीवन की तेज़ रफ़्तार में भागती-दौड़ती ज़िंदगी में बहुत कुछ छूट रहा है। बहुत कुछ संगत नहीं प्रतीत हो रहा। बहुत कुछ मन को मथ रहा है, बेचैन कर रहा है, हम
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ारा सुख-चैन हर रहा है। उन्होंने अपनी खुली आँखों और जाग्रत् चेतना से जीवन की वैविध्यमय स्थितियों में जीवन की जिन जटिलताओं और विडंबनाओं को देखा है, उनके संवेदनशील मन ने संबंधों के छीजते चले जाने की जिस मर्मांतक पीड़ा को महसूस किया, उसे संग्रह की कविताओं में अभिव्यक्ति दी है। मन की अनेक परतों के साथ चेतना और चैतन्य के अनेक बिंब जीवनानुभवों से निकलकर कविता की अंतर्वस्तु बने हैं। आशा-निराशा, घात-प्रतिघात, हर्ष-विषाद की विभिन्न मनःस्थितियाँ कविता के ताने-बाने में पिरोई गई हैं।प्रमोद जैन की कविताएँ मनुष्य विरोधी स्थितियों और वास्तविकताओं पर भावात्मक प्रतिक्रियाओं का प्रति संसार रचती हैं। ज़िंदगी से सीखे गए सबक़ और जीवन जीने के सूत्र भी इन कविताओं में ढूँढ़े जा सकते हैं। हम कैसे जी रहे हैं और हमें किस तरह जीना चाहिए, दोनों ही कवि के सरोकार का हिस्सा हैं। कवि की चिंता मनुष्य की भव्यता और दिव्यता को बचाने की है, उजाले की सत्यता को बचाने की है, जीवन की उत्सवधर्मिता में प्रकृति और मनुष्य को सहचर बनाने की है।
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