Trilochan
Description
वयोवृद्ध त्रिलोचन इस समय हिन्दी के सम्भवत: सबसे गृहस्थ कवि हैं, इस अर्थ में कि हिन्दी भाषा अपनी जातीय स्मृतियों और असंख्य अन्तर्ध्वनियों के साथ, सचमुच
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उनका घर है । वे बिरले कवि हैं जिन्हें यह पूरे आत्मविश्वास से कहने का हक़ है कि पृथ्वी मेरा घर है? अपने इस घर को अच्छी तरह? मैं ही नहीं जानता । इस घर में हुब्बी, पाँचू टिस्कूल बाबा, आदि सब रसे-बसे हैं । त्रिलोचन की कविता साधारण से साधारण चरित्र या घटना या बिम्ब को पूरे जतन से दर्ज करती है मानो सब कुछ उनके पास-पड़ोस में है, कि 'तारे सब सहचर हैं मेरे' । इस संग्रह में त्रिलोचन की ऐसी कई कविताएँ पहली बार पुस्तकाकार संगृहीत हो रही हैं जो उनके किसी पिछले संग्रह में नहीं आ सकी थीं और इधर-उधर पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं । इस चयन में बिना चीख-पुकार मचाये 'पीड़ा-संग्रह' है और यह मानने की बेबाकी भी कि- मुझे अपने मरने का थोड़ा भी दुख नहीं मेरे मर जाने पर शब्दों से मेरा सम्बन्ध छूट जाएगा? त्रिलोचन की कुछ अवधी कविताएँ इस संग्रह को 'घर की बोली' देती हैं । उनमें न सिर्फ 'भाखा क महिमा' प्रगट है पर स्वयं त्रिलोचन का अत्यन्त स्पन्दित भाषा-संसार भी-एक बार फिर । अशोक वाजपेयी
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Genres
No genres specified
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Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Sep, 2002
ISBN
ISBN-13: 9788126705962
ISBN-10: 8126705965
Language
Hindi
No. of Pages
84
Format
Hardcover
Awards & Recognition
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First Reviewed by
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