अनिल जैन
Description
भ्रम होता है दुनिया को वैसा नहीं देख पाना जैसी कि वह (असल में) है। किसी भी समय हम यह नहीं जान सकते कि हमारे अनुभव वास्तविकता नहीं हैं। यह तो आने वाले
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पल में ही कोई जान सकता है कि उसके अनुभव (जो पहले महसूस किये गए थे) जो सच मालूम हो रहे थे, वे वास्तविकता में मिथ्या थे। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि हर भ्रम (जो हम आज जानते हैं) एक समय पर वास्तविकता था।वास्तविकता एक कभी ना थमने वाली बेतरतीब गतिशील प्रकृति के अगणित अवयवों की परस्पर क्रिया है। इसमें कहीं कोई भेद, कोई विभाजन नहीं है; ना तो क्षेत्र में और ना ही समय में। इसके बावजूद, प्रकृति की इस अनियमितता को समझने में असफल मानव इस सृष्टि को नियंत्रण में लाने के ख्याल से इसमें काल्पनिक विभाजन और नियमितता की कल्पना कर बैठता है। जब कभी हम एक निरंतर बदलता स्वरुप देखते हैं तब उसमें किसी एक स्थिर आकार की कल्पना करना हमारा भ्रम है। बादलों को देख कर उनमे शेर का शरीर या लड़की के चेहरे को पहचानना हमारी कल्पना है। ये सब भ्रम हैं क्योंकि ये अस्थायी हैं, इनका स्वरुप बदलता रहता है। हमें यह जानना होगा कि प्रकृति में सब कुछ बदलाव की स्थिति में है। एक बीज जो फूट कर धरती से निकलता है वह दिन-ब-दिन बढ़ता है और अपना स्वरूप हमारी आँखों के सामने बदलता है। वह जो हमने पौधे जैसा देखा, बढ़ कर मजबूत टहनियों, मुलायम पत्तियों, स्वादिष्ट फलों, रंगों भरे फूलों और तीखे काँटों से भरा-पूरा पेड़ बन जाता है; वह और कुछ नहीं इस धरती से उभरता धरती का ही परिवर्तित स्वरुप है। यही आकृति जिसे हम एक पेड़ कहते हैं, आखिरकार एक दिन सूख कर, मर कर फिर से इस धरती में मिल जाती है। अगर हम इस पूरे क्रम को तेज़ी से देखें तो पाएंगे कि सबसे पहले सिर्फ धरती थी, फिर कुछ उभरा, बड़ा हुआ, फला-फूला, कमज़ोर हुआ और फिर धरती में सिमट गया। इस क्रम को अगर बार बार देखेंगे तो पाएंगे कि इसमें और पानी से उभरते बुलबुलों में कोई फर्क नहीं, सिवाय समय अंतराल के। इस सारे खेल में वास्तविकता यह है कि सब कुछ परिवर्तनशील है और भ्रम यह है कि हम उस अस्थायी प्रक्रिया को एक स्थायी
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