Surendra Sharma 'Madhur'
Description
आज हिंदी कविता में नव-गीत, ग़ज़ल, गीतिका और दोहों का बड़ा ही आकर्षक और सार्थक प्रयोग हो रहा है। यह कवि की विशेषता है कि वह एक पंक्ति या दोहे में इतिहा
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स, समाज, राजनीति या मानव-समाज को ऐसा चित्रित कर दे कि पूरी कविता या पुस्तक उसे ना कह पाए जैसे : आधी रात को मिली थी आज़ादी सवेरा आज तक नहीं हुआ कहाँ तो तय था चिराग़ हर मकाँ के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए क्यों रे दुखिया क्या तुझे इतनी नहीं तमीज़ मुखिया के घर आ गया पहने नई कमीज़ पहले दो छंदों में स्वातंत्र्योत्तर उपलब्धियों का तथा दोहे में सामंतवादी प्रवृत्ति का कितना मार्मिक चित्रण है। साहित्य अथवा कविता के स्वरूप की कोई भी व्याख्या क्यों ना की जाए शब्द और अर्थ का साहचर्य अनिवार्य है । व्यक्ति के मनोभावों से लेकर समाज और प्रकृति के सभी रूप कविता के विषय बने हैं। रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम् से लेकर कविता शब्दों की अदालत में खड़े हुए बेक़सूर आदमी का हलफ़नामा है जैसी अनगिनत परिभाषाएँ की गई हैं लेकिन यह सत्य है कि कविता समाज से कटकर नहीं रह सकती आज तो हरगिज़ नहीं। जब मानव सभ्यता अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचकर भी अस्तित्व का भीषण संकट झेल रही है। कन्फ्यूशियस और बुद्ध की शिक्षाओं से प्रेरित देश जब विश्व को नष्ट करने पर तुला हो तब लगता है कि शब्द और अर्थ एक दूसरे से कहीं दूर जा पड़े हैं अथवा सभ्यता की परतें इतनी मोटी हो गई हैं कि शब्द उन्हें भेद कर अर्थ तक नहीं पहुँच पा रहा है फिर भी कवि का यह कर्तव्य है कि उन दोनों को निकट लाकर समाज को रास्ता दिखाने का प्रयत्न करे। यह उसका कर्तव्य भी है और ईष्ट भी। वस्तुतः कविता की आज पहले से अधिक ज़रूरत है ।
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