वीरेन्द्र ग्रोवर
Description
अंग्रेजी के इंम्पॉसिबल (IMPOSSIBLE) शब्द से ‘आई’ ‘एम’ अलग करके हम कहते हैं "आई एम पॉसिबल", अर्थात मैं सम्भव हूँ। हिंदी के ‘असम्भव’ शब्द में ‘अ’ के बाद
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‘ब’ जोड़ कर हम कह सकते हैं ‘अब-सम्भव’, और आत्मविश्वास जगाने या सोच को सकारात्मकता दिशा में मोड़ने का यह एक आसान तरीका है। मुमकिन अरबी शब्द है और बोलचाल की भाषा का अभिन्न अंग। कभी किसी सामाजिक या राष्ट्रीय समस्या पर चर्चा होती है तो लोग कहते हैं - "मोदी है तो मुमकिन है"; लेकिन मोदी सिर्फ व्यक्ति नहीं, एक सोच है, जिसे मूर्त रूप देने में प्रशासन तंत्र और समाज के हर नागरिक का सहयोग आवश्यक है। नेतृत्व की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है, देशवासी और प्रशासनिक तंत्र वही है लेकिन एक अपील पर करोड़ से अधिक लोगों का एलपीजी गैस सब्सिडी छोड़ना, तीन-चार महीनों में चालीस करोड़ से अधिक गरीबों के जनधन बैंक खाते खुलना, भारतीय रुपये को विदेश व्यापार में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बनाने का प्रयास, काश्मीर से धारा 370 हटना, काशी व उज्जैन जैसे सांस्कृतिक व आध्यात्मिक स्थलों का विकास, स्टार्टअप, यूनिकॉर्न और स्वरोजगार के साथ मुद्रा लोन लेने वालों की बढ़ती संख्या, इस को सिद्ध करती है। सांसदों द्वारा गाँव गोद लेने की योजना आगे नहीं बढ़ी। सौ स्मार्ट सिटी बनाने का एक दौर 2024 में पूरा हो चुका है, परिणाम 10-20 शहरों में नजर आये तो बड़ी बात है, क्योंकि योजना बनाना और कार्यान्वयन प्रशासन द्वारा संचालित है, जबकि लाभार्थी सामान्य नागरिक है। आखिर स्मार्ट सिटी निवासी कौन नहीं बनना चाहेगा, लेकिन लक्ष्य के प्रति जन-संचेतना, सहयोग और भागीदारी हो तो फिर 100 ही क्यों, हर नगर और गाँव को स्मार्ट हैबिटैट बनने का सपना देखना चाहिए। आउट ऑफ़ बॉक्स, यानि लीक से हट कर सोचना पड़ेगा ने होंगे
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