Asghar Wajahat
Description
असग़र वजाहत उन विरले कहानीकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने पूरी तरह अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखते हुए भाषा और शिल्प के सार्थक प्रयोग किए हैं। उनकी कहानिय
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ाँ एक ओर आश्वस्त करती हैं कि कहानी की प्रेरणा और आधारशिला सामाजिकता ही हो सकती है तो दूसरी ओर यह भी स्थापित करती हैं कि प्रतिबद्धता के साथ नवीनता, प्रयोगधर्मिता का मेल असंगत नहीं है। ‘मास मीडिया’ से आक्रांत इस युग में असग़र वजाहत की कहानियाँ बड़ी जिम्मेदारी से नई ‘स्पेश’ तलाश कर लेती हैं। राजनीति और मनोरंजन द्वारा मीडिया पर एकाधिकार स्थापित कर लेने वाले समय में असग़र की कहानियाँ अपनी विशेष भाषा और शिल्प के कारण अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई हैं। ‘मैं हिन्दू हूँ’ असग़र का चौथा कहानी-संग्रह है। वे न केवल अपनी गति बनाए हुए हैं बल्कि उनके रचना- संसार में संवेदना के धरातल पर कुछ परिवर्तन भी आए हैं। हास्य, व्यंग्य और खिलंदड़ापन के साथ-साथ अब उनकी कहानी में गहरा अवसाद और दुख शामिल हो गया है। बहुआयामी जटिल यथार्थ और आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए वे नए ‘हथियारों’ की तलाश में दिखाई पड़ते हैं। विषय की विविधता के बावजूद उनकी कहानियों में साम्प्रदायिकता की समस्या तथा सामाजिक अवमूल्यन का अपना अलग महत्त्व है। उनकी कहानियाँ दरअसल उन लोगों की कहानियाँ हैं जो समाज के हाशिए पर पड़े हैं लेकिन बड़े सामाजिक संदर्भों से जुड़ने का जतन करते रहते हैं। इन कहानियों मे असग़र कल्पना और फैंटेसी के सम्मिश्रण से एक ऐसी भाव-भूमि की संरचना करते हैं जो कहानी को विस्तार देती है। उनकी कहानियाँ पाठकों से माँग करती हैं कि शब्दों और वाक्यों के समान्तर रचे गए अनकहे संसार की परतें भी खोलते रहें। रोचकता की तमाम शर्तों पर पूरा उतरते हुए असग़र वजाहत की कहानियाँ गम्भीर विश्लेषणात्मक रवैये की माँग करता है।
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Genres
No genres specified
Tags
Literary Collections
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Jan, 2007
ISBN
ISBN-13: 9788126712045
ISBN-10: 812671204X
Language
Hindi
No. of Pages
150
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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