Raghuvir Sahay
Description
रघुवीर सहाय की कविताओं में हम एक ऐसे आधुनिक मानस को देख पाते हैं जो बौद्धिक और रागात्मक अनुभूतियों से सन्तुष्ट होकर अपने लिए एक सुरक्षित संसार की सृष्
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टि नहीं कर लेता % उसमें रहने लगना कवि के लिए एक भयावह कल्पना है । आज के पतनशील समाज में ऐसे अनेक सुरक्षित संसार विविध कार्य–क्षेत्रों में बन गए हैंµसाहित्य में भी और इनमें बूड़ जाने का खतरा पिछले बीस वर्षों में बढ़ता–बढ़ता तीव्रतम हो गया है । परन्तु (बातचीत में रघुवीर सहाय कहते हैं कि) समाज कविताओं से भरा पड़ा है % सड़क पर चलते ही हम उनसे टकराएँगे और हर कविता एक नया परिचय कराएगी । इस संग्रह की रचनाएँ कवि के निरन्तर बढ़ते हुए परिचयों के पीछे उसकी सामाजिक चेतना के विकास का भी संकेत देती हैं % कवि की चिन्ता है कि उस विकास के बिना कविता लिखते जाने का कोई मतलब ही नहीं होगा । आज के पतनशील समाज के प्रति कवि की दृष्टि विरोध की है परन्तु वह अपने काव्यानुभव से जानता है कि वह रचना जो पाठक के मन में पतन का विकल्प जाग्रत् नहीं करती, न साहित्य की उपलब्धि होती है न समाज की । ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की परम्परा में वह उस शक्ति को बचा रखने को आतुर है जो उसने ‘दूसरा सप्तक’ और ‘सीढ़ियों पर धूप में’ पाई थी और जिस पर आए हुए खतरे को उसने ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ में दिखाया था । वह मानता है कि यही खोज नए समाज में न्याय और बराबरी की सच्ची लोकतन्त्रीय समझ और आकांक्षा जगाती है और ऐसे समाज की रचना के लिए साहित्यिक और साहित्येतर क्षेत्रों में संघर्ष का आधार बनती है । जहाँ कहीं जन की यह शक्ति पतनोन्मुख संस्कृति के माध्यमों द्वारा भ्रष्ट की जा रही हो वहाँ वह चेतावनी देता है और जहाँ वह
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Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Jan, 1982
ISBN
ISBN-13: 9788126706006
ISBN-10: 8126706007
Language
Hindi
No. of Pages
104
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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