Sarveshwar Dayal Saxena
Description
शब्द पड़ने लगे छोटे दर्द बढ़ने लगा कहे भी थे जो कभी सब हो गए अनकहे छठे दशक में हिन्दी कविता में जो ताजश्गी और सम्पन्नता आई थी, वह आज भले ही इधर-उधर छितर
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ा गई दिखती हो, पर सर्वेश्वर के काव्य में आज भी सही- सलामत मौजूद है। इंसान के गहरे दुखों में सामयिक दृश्यों का अर्थ व्यक्त करने वाली वही सहजता उनकी कविता में अन्त तक मिलती है जो पहले कविता-संग्रह ‘काठ की घंटियाँ’ के प्रकाशन ने उनके नाम के साथ जोड़ी थी। राजनीति की अमानवीयता और मानव सम्बन्धों के विशृंखलन का त्रास सर्वेश्वर ने समाज के दबे हुए वर्गों, युद्ध में खेत रहे समाजों और प्राकृतिक कोप में असहाय मरते लोगों के बीच महसूस और अभिव्यक्त किया है। यह संग्रह सर्वेश्वर की काव्य-यात्रा में किसी मोड़ का सूचक नहीं, केवल उन अंतर्धाराओं के पहले से अधिक अधीर और मुखर हो उठने का सूचक है जिन्हें पाठक तथा समीक्षक उनकी कविता में बराबर पाते रहे हैं। ‘कुआनो नदी’ माला की तीन कविताओं के माध्यम से सर्वेश्वर ने एक ऐसा गहन प्रतीक हिन्दी कविता को दिया है, जिसका अर्थवृत्त समय के साथ फैलता रहा है।
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