Ashok Singh
Description
'फिर वसन्त आये..' से जो काव्य-यात्रा शुरू हुई थी, 'काव्य तरंग' की धारा से पाठकों को सराबोर करती हुई अब एक दिलचस्प मुकाम पर आकर ठहरी है। ख्वाबों की दुन
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िया में, जहाँ पर अनजाने में ही भटकता हुआ कोई ख्वाब आकर रूह से टकराकर सिर्फ दिल में रहता ही नहीं है बल्कि बिखरकर जज्ब हो जाता है हर एक रग-रग में, और जगा देता है मन में सोये हुए हर जज़्बात को । बना देता है इस पड़ाव को इतना हसीन कि इसमें क्या कुछ नहीं महसूस होने लगता है..? इश्क, प्रेम, जुदाई, ख़ामोशी, दीवानगी, मस्तानापन, बहार, ख़िज़ाँ और न जाने क्याक्या... | मजे की बात ये है कि ये सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द ही होने लगता है, शायरी के इस हसीन सफ़र के इस मज़ेदार पड़ाव पर, इसी मुकाम पर। ...और इस दिलकश मुकाम का नाम है 'ख़्वाब कोई बिखर गया...'
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