Anuradha Saxena
Description
कभी कभी मैं बिल्कुल भी नहीं लिखना चाहती हुँ, परंतु मेरी अंत:आत्मा मुझे कचोटने लगती है, बेचैन करने लगती है, और इसलिए अपनी अंत:आत्मा को शांत करने के लिए
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अपने अहसासों को पन्नो पर उकेड़ना पड़ता है, हर अहसासों को लफ़्ज़ देना पड़ता है, पर वो भी आधी-अधूरी ही रहती हैं!
बचपन से ही मुझे कल्पनाओं की दुनिया बेहद पसंद रही है, क्यूँकि हक़ीक़त की दुनिया में अक्सर ही हम बँधे रहते हैं, पर कल्पनाओं की दुनिया में हर तरह से स्वतंत्र रहते हैं, उसी में से कुछ कल्पनाओं को, तो कुछ अपनी अहसासों को, तो कुछ अपनो के अहसासों को, तो कुछ दूसरों के अहसासों को लफ़्ज़ों में बाँध के काव्य का रूप दी हुँ, और उसी अहसासों का एवं मेरे शुरुआती दौर के काव्य का समावेस है “ख़ामोश लफ़्ज़ों की दास्ताँ”!!
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