Dr.Mahesh Tiwari
Description
प्रस्तुत पुस्तक कवि केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और सृजन को उसकी सम्पूर्णता में विश्लेषित करती है। केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशील कविता की केन्द्रीय धारा के क
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वि हैं। उन्होंने हिन्दी की प्रगतिशील लोकोन्मुख परम्परा को अपनी कविता में नये सौन्दर्यबोध के आलोक में उद्भासित किया है। वे लोकजीवन के चतुर-चितेरे हैं। एक तरफ़ उन्होंने लोकजीवन, ग्रामीण प्रकृति, किसानों-मज़दूरों के संघर्ष को जिस आत्मीयता से अभिव्यक्त किया है, तो दूसरी तरफ़ अत्यन्त आक्रामक तल्खी के साथ जन-विरोधी और शोषक शक्तियों को बेनक़ाब भी किया है। यह भी कहा जा सकता है कि उनकी कविता जायसी, तुलसी, घाघ और भट्टरी की परम्परा को नये सन्दर्भ में प्रस्तुत करती है। इसके द्वारा पाठक अग्रवालजी की कविताओं के वस्तुगत वैविध्य और शिल्पगत सौन्दर्य का एक साथ आनन्द उठा सकता है। केदारनाथ अग्रवाल को सम्पूर्णता में विश्लेषित करने की दृष्टि से यह एक पठनीय और उल्लेखनीय समीक्षा कृति है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हिन्दी जगत् इस समीक्षा कृति का खुले मन से स्वागत करेगा।
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