संपादक श्रीमती रूपा व्यास
Description
क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय जी ने कहा है :-
चैन की बाँसुरी बजाइये आप
शहर जलता है और गाइये आप
हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं
असली सूरत ज़रा दिखाइये आ
...
प..
आचार्य रामचंन्द्र शुक्ल के अनुसार -कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है, मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करुणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्तसंसार में व्याप्त हो गया है। हिन्दी की सबसे बड़ी विशिष्टता उसकी सामाजिकता ही मानी जाती रही है। उसकी प्रासंगिकता का यह बहुत बड़ा कारण रही है। अपने समाज से कटा साहित्य हो सकता है बाजार, लोकप्रियता के मानकों पर बेहतर साबित होता हो लेकिन जमीन के अभाव में वह अधिक समय तक ठहर नहीं पाते। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि साहित्य में लोकरुचियों,लोकरंजन के लिए भी स्पेस होना चाहिए, लेकिन जिस साहित्य में लोक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती है वह अपने समाज का प्रतिनिधि साहित्य नहीं हो सकता, अपने समय की राजनीति को दिशा नहीं दिखा सकता। अंत में मैं इंक़लाब पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 'काव्य-क्रांति ' की संपादक होने के नाते सभी सम्मिलित रचनाकारों के प्रति साहित्य से क्रांति की आशा करती हूँ और इंक़लाब पत्रिका के सह संपादक श्री दीपक क्रांति तथा प्रधान संपादक श्री सागर यादव 'ज़ख़्मी' जी का हृदयतल से सहयोग हेतु आभार व्यक्त करती हूँ...रूपा व्यास,सम्पादक : काव्य क्रांति प्रधान संपादक : सागर यादव 'ज़ख्मी
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