Shashi Prabha Shastri
Description
यों तो नारी-पुरुष संबंधों पर हिंदी में कई कोणों से काफी कुछ लिखा गया है, किन्तु ककरेखा में जिस ढंग से इन संबंधों की वास्तविकताओं से सीधा साक्षात्कार ह
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ै, वह दुर्लभ है। मध्यवर्गीय नारी के प्रेम-विवाह के बाद की भयावहता को उकेरती यह कृति मानवीय संबंधों की त्रासदी का अनुपम दस्तावेज़ बन जाती है। नगरीय जीवन की भागम-भाग में उलझते दांपत्य संबंधों के बीच शिक्षित मध्यवर्गीय नारी के एकाकीपन को लेखिका ने सटीक अभिव्यक्ति प्रदान की है। पत्नी की आत्मिक आवश्यकताओं से निस्संग, इस उपन्यास का बुद्धिजीवी नायक अपने आचरण में इतने ठंडेपन का शिकार रहता है कि उनके संबंधों के बीच अस्पष्ट-सी जड़ता हर वक्त सालती रहती है। अपने-अपने स्वार्थों में आकण्ठ डूबे लोगों के बीच भारतीय नारी की पीड़ा को लेखिका ने किसी खोखले आदर्शवाद का जामा नहीं पहनाया है, बल्कि निरंतर समकालीन सचाइयों से बेहिचक सामना किया है। नारी-सुलभ संवेदना से ओत-प्रोत यह कृति पाठकों के दिमाग में कई मानवीय प्रश्न उठाती है। भाषा और शैली का गठन ऐसा है कि पाठक अंतिम पृष्ठ तक पढ़ने को विवश हो।
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