Kashinath Singh
Description
सुप्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह पिछले चालीस वर्षो से हिन्दी कथा में सक्रिय और तरो-ताजा हैं । उन्होंने अपने लेखन के जरिए पाठकों की नई जमात तैयार की है-य
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ुवाओं की जमात अपना मोर्चा लिखकर और साहित्य से कोई सरोकार न रखनेवाले सामान्य पाठकों की संस्मरण और काशी का अस्सी लिखकर । लेकिन ऊपर से आरोप यह कि उन्होंने साहित्य की कुलीनता की धज्जियाँ उड़ाई हैं । इसके एवज में उन्होंने गालियाँ भी खाई हैं, उपेक्षाएँ भी झेली हैं और खतरे भी उठाए हैं । यह यों ही नहीं है कि कथा-कहानी में आनेवाली हर युवा पीढ़ी काशी को अपना समकालीन और सहयात्री समझती रही है । ऐसा क्यों है-यह देखना हो तो कहनी उपखान पढ़ना चाहिए । कहनी उपखान काशी की सारी छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह है-अब तक की कुल जमा-पूँजी । मात्र चालीस कहानियाँ । देखा जाना चाहिए कि वह कौन-सी खासियत है कि इतनी-सी पूँजी पर काशी लगातार कथा-चर्चा में बने रहे हैं और आलोचकों के लिए भी 'अपरिहार्य' रहे हैं । काल और काल से छेड़छाड़ और मुठभेड़-पहचान है काशी की कहानियों की । काल के केन्द्र में है सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों से घिरा आदमी-कभी अकेले, कभी परिवार में, कभी समाज में । इस आदमी से मिलना यानी कहानियों को पढ़ना हरी-भरी जिन्दगी के बीच चहलकदमी करने जैसा है । न कहीं बोरियत, न एकरसता, न मनहूसियत, न दुहराव । उठने-गिरने, चलने-फिरने, लड़ने-हारने में भी हँसी-ठट्ठा और व्यंग्य-विनोद । जिन्दादिली कहीं भी पाठक का साथ नहीं छोड़ती । जियो तो हँसते हुए, मरो तो हँसते हुए-यही जैसे जीने का नुस्खा हो पात्रों के जीवन का । जैसे-जैसे जिन्दगी बदली है, वैसे-वैसे काशी की कहानी भी बदली है-अगर नहीं बदला है तो कहानी कहने का अन्दाज । जातक, पंचतंत्र और लोकप्रचलित कथाशैलियाँ जैसे उनके कहानीकार के खून में हैं । कई कहानियाँ तो चौपाल या अलाव के गिर्द बैठकर सुनने का सुख देती हैं । आइए, वह सुख आप भी लीजिए कहनी उपखान पढ़कर । कहनी (कहानी) और उपखान (उपाख्यान) कहकर तो काशी ने लिया है, आप भी लीजिए पढ़कर, क्योंकि काशी को पढ़ना ही सुनना है ।
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