परवीन गगनेजा
Description
प्रवीण गगनेजा एक उभरती हुई कवयित्री हैं उनके पहले काव्य संग्रह घेरा मेरी यादों का के बाद कहो ना उनका दूसरा कविता संग्रह है !
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ते हुए कुछ बातें बहुत स्पष्ट रूप में उभरकर सामने आती हैं! कवयित्री की ईश्वर पर गहरी आस्था है जो उनकी पहली कविता से शुरू होकर कई कविताओं में दृष्टिगोचर होती है!उनकी कवितायेँ कहीं कृष्ण का तो कहीं राम का आह्वान करतीं हैं ; कहीं दीपावली की जगमग तो कहीं सावन रुत की मस्ती का वर्णन करतीं हैं !
"आज सुबह जब बरसा सावन
तन मन था सब भीग रहा
धरती की चूनर लहर रही
झूलों का मौसम आया है !"
लेकिन सावन की फुहारें अपने साथ शिव का तांडव रूप भी ले आतीं हैं ! कवयित्री की वातावरण के प्रति चिंता इन विचारों में झलकती है कि मानव की कुदरत के दोहन की प्रवृति वातावरण का संतुलन बिगाड़ रही है !
हिंदी दिवस पर हिंदी भाषा को समर्पित कविता शिक्षक दिवस पर शिक्षकों के योगदान पर लिखी कविता बैसाखी पर इतिहास और वर्तमान को टटोलती कविता सार्थक भावों को अभिव्यक्त करतीं हैं !
"उर्मिला की व्यथा" में तुलसीदास द्वारा उर्मिला के साहस, त्याग और हौसले को पहचाने और सराहे ना जाने का उपालंभ भी मिलता है और उसकी मौन तपस्या का मुखर गुणगान भी !
"आओ विचार करें" कविता आज़ादी के पचहत्तर साल पूरे होने पर भी जिन विसंगतियों से हम जूझ रहे हैं उन पर सटीक टिपण्णी करती है :
द्रौपदी का चीरहरण जारी है
पर्यावरण का हनन जारी है
जाति धर्म की राजनीति जारी है
असत्य भ्रष्टाचार बेईमानी का बोलबाला जारी है
घोटालों आंकड़ों का खेल जारी है
एक दूसरे पर दोषारोपण जारी है
संसद में हंगामा जारी है
लेकिन अंत में
"आओ मिलजुल कर इक नई इबारत उकेरें "
के साथ आशा का सन्देश भी देती है !
कोरोना के समय की हताशा व दूरियों की चर्चा भी कुछ कविताओं में मिलती है तो कभी कवयित्री "मन करता है" नामक कविता में अपने भावों को कुछ यूँ प्रकट करती है :
"नदी के स्वच्छ जल की तरह बहती रहूँ
मस्त हवा में मस्ती से नाचूँ गाऊँ
सफ़ेद बर्फ सी बिछ जाऊँ ...
नीले आस्मां से झांकते
सफ़ेद बादलों की तरह
आज़ाद हो बिखर जाऊँ "
"मेरी चाह" कविता में एक बेटी अपनी माँ से पढ़ने का अधिकार चाहती है :
"माँ मेरी इक बात सुनो
इक कलम मुझे दिला दो
मैं भी पढ़ना चाहती हूँ
अफसर बनना चाहती हूँ
मैँ भी हूँ इस देस की बेटी
देश हित में भागीदारी चाहती हूँ !"
शीर्षक कविता "कहो ना" जिसे संग्रह के अंत में रखा गया है अनकही पीड़ा को टटोलते हुए कहती है :
"सच कह दूँ
कहो ना दरकते रिश्तों की दरकती दीवार
फिर से ईंट गारा सीमेंट चाहती है
बस इतनी सी बात है
बस इतनी सी बात है "
प्रवीण गगनेजा की कविताओं की भाषा अत्यंत सहज , सरल है ! प्रवीण गगनेजा का काव्य संग्रह विविध विषयों को छूते हुए सटीक भावों को व्यक्त करता है ! भाषा और शिल्प की दृष्टि से कविताओं में समय के साथ और परिपक्वता आएगी ऐसा मेरा विश्वास है ! काव्य संवेदना के धरातल पर ये कवितायेँ अपना प्रभाव पाठक के मन पर डालतीं हैं!
प्रवीण गगनेजा को इस संग्रह के प्रकाशन पर बधाई तथा उनके आगे के साहित्यिक सफर के लिए अनेकों शुभकामनाएं !
सीमा जैन
हिंदी व अंग्रेज़ी कवयित्री, लघु कथा लेखिका,
अनुवादिका एवं सम्पादिका
एसोसिएट प्रोफेसर एवं अंग्रेज़ी विभाग्यध्यक्षा ( सेवा निवृत )
कन्या महा विद्यालय जालंधर , पंजाब
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Genres
History
Tags
Asian
Poetry
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Inkalab publication
Month-Year
Nov, 2021
ISBN
ISBN-13: 9789391834166
ISBN-10: 9391834167
Language
Hindi
No. of Pages
70
Format
Paperback
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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