हर्षित अग्रवाल
Description
कुछ कहानियाँ कभी पूरी नहीं होतीं, लेकिन उनके जज़्बात हमेशा ज़िंदा रह जाते हैं। कभी वो याद बनकर ठहर जाते हैं, कभी तन्हाई बनकर साथ चलते हैं, और कभी काग़
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ज़ पर उतरकर किसी की पूरी दुनिया कह जाते हैं।"काग़ज़ : जज़्बातों का आशियाना" उन्हीं मोहब्बतों, ख़ामोशियों, यादों और अधूरी बातों का सफ़र है, जिन्हें शायद सिर्फ़ काग़ज़ ही समझ पाता है। इस किताब में आपको प्यार मिलेगा, दर्द मिलेगा, बेवफ़ाई मिलेगी, मेरे कान्हा जी मिलेंगे और शायद कहीं ना कहीं ख़ुद का एक हिस्सा भी मिल जाएगा।
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