Goswami, Mamani Rayachama
Description
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित असमिया उपन्यास मामरे धरा तरोवाल यानी जंग लगी तलवार में मामोनी रायसम गोस्वामी (इन्दिरा गोस्वामी) ने श्रमिकों की मज
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बूरी और बदहाली की गाथा प्रस्तुत की है। श्रमिकों को हड़ताल के लिए कौन प्रेरित करता है और उससे किस तरह उनकी हालत दिन-ब-दिन बदत्तर होती जाती है, इसी के चरम बिन्दु तक इस उपन्यास की कहानी जाती है। पुरानी होती जाती पड़ताल के साथ ही अनिश्चितता और हताशा से पीड़ित श्रमिक यन्त्र की तरह दिन काटते हैं। भूख की ज्वाला में खलासी लंगर में स्वीपर लाइन के बच्चे रोटी के लिए कुत्तों तरबूज जानवरों की तरह चबाकर खानेवाली बसुमती बुढिया और बीमार पति तथा बच्चे के लिए दवाई और दूध खरीदने में असमर्थ और अपने सम्मान को दाँव पर लगानेवाली नारायणी की मनोदशा एक जैसी ही है। श्रमिकों की यूनियन के नायक यशवन्त द्वारा रात के अँधेरे में एक तलवार लेकर भ्रष्ट नेता को धमकाने के बावजूद स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता। क्योंकि पूरी व्यवस्था के परिवर्तन के बिना यह सम्भव नहीं हो सकता।फिर भी इस उपन्यास में आशा की किरण दिखाई पड़ती है। उपेक्षित व्यक्ति भी आशावादी हो सकता है..शिक्षा,चेतना,प्रगति और ज्ञान से यह सम्भव हो सकता है। इसी रास्ते से ये लोग उपेक्षा,अनादर और शोषण के चक्रव्यूह से मुक्ति पाना चाहते हैं। कड़ी मेहनत के बावजूद दो वक्त की रोटी के लिए हाहाकार करनेवाले, बिना वजह मालिकों से तिरस्कृत और जानवरों की तरह जीवन काटनेवाले इन लोगों के आत्मसम्मान और आत्ममर्यादा की भावनाएँ इस उपन्यास में मन को छू लेने वाली शैली में अंकित है। श्रीमती गोस्वामी ने इन सभी रचनाओं में अपने स्थानीय पात्रों एवं परिवेश को ही नहीं जिया है-अपनी रचनात्मक प्रतिश्रुतियों का भी भरपूर निर्वाह किया है।प्रस्तुत उपन्यास के साथ इन्दिरा गोस्वामी जी दो अन्य दो आरम्भिक कृतियाँ भी इसमें सम्मिलित हैं-जिनसे उनकी रचनात्मक क्षमता और सजग लेखनी का पता चलता है।
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Genres
No genres specified
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Reading Moods
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Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Sahitya Akademi
Month-Year
Jan, 2003
ISBN
ISBN-13: 9788126017065
ISBN-10: 8126017066
Language
Hindi
No. of Pages
215
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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