Ashutosh Varshney
Description
समाज विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी किताबें कम ही हैं जो अपने भारी-भरकम विषय में प्रमुख स्थान बनाने के साथ ही अपने लेखक को स्थापित कर दें। यह एक ऐसी ही कि
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ताब है। पर इसके लिए तर्कों और विचारों की नवीनता और विलक्षणता के साथ लेखक का भारी श्रम भी श्रेय का हकदार है। हिन्दू-मुस्लिम दंगों संबंधी काफी विवरणों को छान डालने के बाद लेखक ने छह शहरों का सघन अध्ययन भी किया है - इसमें वर्षों का श्रम लगा है, अनेक सहयोगियों की मदद लेनी पड़ी है और संभवतः लाखों डालर खर्च हुए हैं। लेकिन दंगों और नागरिक समाज की मुस्तैदी या ढील में एकदम स्पष्ट रिश्ता देखने-दिखाने वाली इस किताब ने इस सब श्रम-खर्च और बौद्धिक ऊर्जा के खर्च की सार्थकता साबित की है, लेखक ने ठोस प्रमाणों के आधार पर अभी तक प्रचलित जातीय दंगों संबंधी उन सब सिद्धांतों को खारिज किया है जो अनेक प्रश्न अनुत्तरित ही छोड़ देते थे। यही कारण है कि भारतीय शहरों के अध्ययन पर आधारित इस पुस्तक की चर्चा दुनिया भर में हुई है। पर यह किताब सिर्फ अकादमिक जगत की चर्चा भर की चीज नहीं है। यह हर पाठक, इस विषय में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति के मन में कुछ सवाल उठाती है, विभिन्न किस्म के संगठनों से जुड़कर अपना कुछ वक्त समाज को देने की प्रेरणा देती है, पार्टियों-मजदूर संघों, व्यापार संगठनों, पेशागत संगठनों वगैरह से सामाजिक चौकसी की माँग करती है। यह स्थापित करती है कि बड़े शहरों के उदय के साथ इस चौकसी के बिना दंगे होंगे ही और सामाजिक चौकसी ही दंगे रोकने का अचूक मंत्र है।
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