Dr. Puneet Bisaria • Dr. Virendra Singh Yadav
Description
यद्यपि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा 19वीं शताब्दी से आरंभ होती है, किंतु 19वीं शताब्दी से पूर्व के इतिहास आधारित कतिपय ग्रंथ प्राप्त होते है
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ं, जैसे—‘भक्तमाल’, ‘कविमाला’, ‘कालिदास हजारा’, ‘चौरासी वैष्णवन की वार्त्ता’ आदि, परंतु इन सभी में ऐतिहासिक दृष्टिकोण का अभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। आधुनिक स्वरूप में इतिहास लेखन की परंपरा का प्रथम प्रयास फ्रेंच विद्वान् गार्सा द तासी के ग्रंथ ‘इस्तवार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी’ (सन् 1839) के रूप में उपलब्ध होता है, किंतु इस ग्रंथ में हिंदी व उर्दू के कवियों का अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार वर्णन है और काल विभाजन व युगीन प्रवृतियों की अवहेलना आदि की कमियाँ हैं। दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शिवसिंह सेंगर का ‘शिवसिंह सरोज’ (सन् 1883) है। इसमें लगभग एक हजार कवियों के जीवन चरित्र एवं उनकी कविताओं के उदाहरण देखने को मिलते हैं। ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ पत्रिका के विशेषांक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन ने ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ (सन् 1888) लिखकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया और इसमें पहली बार कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्णन के साथ ही काव्य-प्रवृत्तियों का उल्लेख तथा युगीन परिस्थितियों का चित्रण भी किया गया है। इतिहास लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य मिश्र बंधुओं द्वारा ‘मिश्र बंधु विनोद’ (सन् 1913) लिखकर किया गया है। इसमें लगभग 5000 कवियों का परिचय दिया गया है तथा आठ कालखंडों में विभाजन, साहित्यिक अंगों का विश्लेषण है, किंतु इसमें भी इतिहास दृष्टि का अभाव है।
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