Edited by Pushpa Bharti
Description
"भारत के पुनर्जागरण की वेला में अनेकानेक आंदोलन उठे परंतु उनमें दो प्रमुख थे-एक राष्ट्र को स्वतंत्र करने का आंदोलन और दूसरा राष्ट्र को एक भाषा से सुसं
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गठित करने का आंदोलन। वस्तुतः कालक्रम में यह दूसरा आंदोलन पहले उठा, जैसा कि स्वाभाविक भी था और मैं कहना चाहूँगा कि यह पहले से अधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण भी था। स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् स्वतंत्रता का आंदोलन समाप्त हो गया, पर राष्ट्र भाषा का आंदोलन आज भी चल रहा है और उस समय तक चलता रहेगा जब तक कि यह समस्त देश एक भाषा के सुवर्ण सूत्र में आबद्ध नहीं हो जाता। इस देश की विविधता सदियों से इतिहास के घटना चक्रों में पड़ी एकसूत्रता और अखंडता के लिए चीत्कार कर रही है। बाहरी रज्जुपाशों और श्रंखलाओं से जकड़ कर यह एकता नहीं लाई जा सकती। उसे तो किसी आंतरिक सूत्र से ही लाना होगा और वह सत्र एक भाषा का है। हिंद के लिए हिंदी का है। जब तक यह देश अपनी सांगिक और स्वाभाविक एकता नहीं प्राप्त कर लेता तब तक इसकी स्वतंत्रता अधरी है। इसकी स्वतंत्र सत्ता अस्पष्ट! इसीलिए आज वर्षों से श्रद्धेय टंडनजी परम आस्था और दढता के स्वरों में यह उद्घोषणा करते आ रहे हैं कि राष्ट्रीयता ही हिंदी और हिंदी ही राष्ट्रीयता है। इस ऋचा के उदार और उदात्त अर्थ को न समझना अपनी बुद्धि की परिक्षीणता, हृदय की संकीर्णता और दष्टि की मलिनता का ही सबूत देना है।" 'आल इंडिया रेडियो लखनऊ में भाषण' से, 1960
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