Sanjay Agarwala
Description
कहते हैं हमारी पृथ्वी शेषनाग के कंधों पर टिकी हुई है परंतु व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो आज हम जिसके ऊपर निर्भर होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं, वह
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है मजदूर या श्रमिक वर्ग। यह समाज का वह तबका है, जिसकी बदौलत सारे क्रियाकलापों को अंजाम मिलता है। अपना खून सींच कर सारी दुनिया को सुख देने वाले इस वर्ग की जिंदगी हमेशा अंधकारमय ही रह गई। इसमें कभी उजाला प्रवेश कर ही नहीं पाया। उनकी मजदूरी का कभी सही मूल्य भी उन्हें नहीं मिला, फिर भी वे चुप्पी साधे, मालिक के समक्ष हाथ जोड़े मनुहार करते ही नज़र आए। श्रम को ही अपनी पूजा और उपास्य समझने वाले इस वर्ग के कष्टों का अनुमान शायद हम उस वक्त जरूर लगा पाए होंगे जब ये पलायन करने को मजबूर हुए। एक ओर कोरोना जैसी महामारी की मार और दूसरी ओर गरीबी की मार सहने को ये बाध्य हुए। फिर भी न जाने वो कैसी सहनशक्ति इनके अंदर है, जिसके सामने रास्ते भी छोटे पड़ते दिखाई दिए। इनकी दशा पहले जैसी थी, आज भी वैसी ही है, कोई बदलाव नजर नहीं आता। इस दयनीय स्थिति के बीच भी, सबकुछ सहते हुए भी इनके चेहरे से एक ऐसा स्वाभिमान झलकता है जो चीख - चीखकर कहता है, “हाँ ! मैं मजदूर हूँ” और मुझे मजदूरी करने में कोई लज्जा नहीं। कम से कम ये किसी का हक तो नहीं मारते। ये तो बस देने में ही विश्वास रखते हैं। इनके योगदान को यदि हम नकार दें तो पूरी दुनिया का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। इस श्रमसाध्य श्रमिक या मजदूर वर्ग को मेरा करबद्ध नमन।
धन्यवाद।
संजय अग्रवाला
संपादक
जलपाईगुड़ी
24/08/2020
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