Anita Rakesh
Description
‘गुरुकुल’ का यह दूसरा भाग उसी चिन्ता का गम्भीर और गहन विस्तार है जो उपन्यास के पहले भाग में अंकुरित होती दिखाई दी थी। पहले उपन्यास का भोला-भाला पार्थ
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यहाँ पर्याप्त वयस्क हो चुका है। वह न सिर्फ समाज की थोथी नैतिकता की अँधेरी गलियों में दुबके गे समुदाय की दुनिया को खुली आँखों से देख रहा है, बल्कि उनके हित में एक निर्णायक संघर्ष की तैयारी भी कर रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्दी में वैकल्पिक यौन-व्यवहार के माध्यम से सामाजिक और मानवीय सहिष्णुता की तलाश का यह पहला प्रयास है। सवाल बहुत सीधा है कि स्वतन्त्रता और समता के अलम्बरदार हमारे तथाकथित लोकतान्त्रिक समाज में कुछ लोगों को सिर्फ उनके ‘सेक्सुअल प्रिफेरेंस’ के कारण ही क्यों समाज की घृणा और कानून की क्रूरता का पात्र बना दिया जाता है! लेकिन जवाब इतना सीधा नहीं है, क्योंकि न हममें इतना नैतिक साहस है और न इतनी इंसानियत। यह उपन्यास भी इसका जवाब नहीं देता, यह उसकी जिम्मेदारी भी नहीं है, वह बस इस सवाल के पीछे छिपे हमारे खूंख्वार और दानवी चेहरों को उघाड़ता है। वह बताता है कि हम क्या हैं, हमारी नैतिक पवित्रता क्या है, हमारी न्याय व्यवस्था क्या है और हमारी पुलिस क्या है, और इस तरह इस सवाल के जवाब की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
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